
अध्याय १० / १८
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विभूतियोगः
Vibhūti Yoga · ४२ श्लोक
अर्जुन पूछता है कि दिव्यता को कहाँ खोजे। कृष्ण एक लम्बी सूची से उत्तर देते हैं: पर्वतों में हिमालय, नदियों में गंगा, शब्दों में एक अक्षर। जहाँ भी कोई वस्तु अपनी पूर्णता में हो, वहीं देखो।
यह अध्याय आपको कहाँ छोड़ता है
निराकार खोजने योग्य बन जाता है। अर्जुन को ध्यान टिकाने के लिए कुछ मिलता है, जो उसे आगे आने वाले के लिए तैयार करता है।
श्लोक
संस्कृत पूर्ण · व्याख्या जारी हैअध्याय १० · श्लोक १
भूय एव महाबाहो शृणु मे परमं वचः ।यत्तेऽहं प्रीयमाणाय वक्ष्यामि हितकाम्यया॥
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अध्याय १० · श्लोक २
न मे विदुः सुरगणाः प्रभवं न महर्षयः।अहमादिर्हि देवानां महर्षीणां च सर्वशः॥
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अध्याय १० · श्लोक ३
यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम्।असम्मूढः स मर्त्येषु सर्वपापैः प्रमुच्यते॥
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अध्याय १० · श्लोक ४
बुद्धिर्ज्ञानमसंमोहः क्षमा सत्यं दमः शमः।सुखं दुःखं भवोऽभावो भयं चाभयमेव च॥
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अध्याय १० · श्लोक ५
अहिंसा समता तुष्टिस्तपो दानं यशोऽयशः।भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव पृथग्विधाः॥
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अध्याय १० · श्लोक ६
महर्षयः सप्त पूर्वे चत्वारो मनवस्तथा।मद्भावा मानसा जाता येषां लोक इमाः प्रजाः॥
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अध्याय १० · श्लोक ७
एतां विभूतिं योगं च मम यो वेत्ति तत्त्वतः।सोऽविकम्पेन योगेन युज्यते नात्र संशयः॥
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अध्याय १० · श्लोक ८
अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते।इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विताः॥
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अध्याय १० · श्लोक ९
मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम्।कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च॥
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अध्याय १० · श्लोक १०
तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम्।ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते॥
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अध्याय १० · श्लोक ११
तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः।नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता॥
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अध्याय १० · श्लोक १२
परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान्।पुरुषं शाश्वतं दिव्यमादिदेवमजं विभुम्॥
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अध्याय १० · श्लोक १३
आहुस्त्वामृषयः सर्वे देवर्षिर्नारदस्तथा।असितो देवलो व्यासः स्वयं चैव ब्रवीषि मे॥
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अध्याय १० · श्लोक १४
सर्वमेतदृतं मन्ये यन्मां वदसि केशव ।न हि ते भगवन्व्यक्तिं विदुर्देवा न दानवाः॥
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अध्याय १० · श्लोक १५
स्वयमेवात्मनाऽत्मानं वेत्थ त्वं पुरुषोत्तम।भूतभावन भूतेश देवदेव जगत्पते॥
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अध्याय १० · श्लोक १६
वक्तुमर्हस्यशेषेण दिव्या ह्यात्मविभूतयः।याभिर्विभूतिभिर्लोकानिमांस्त्वं व्याप्य तिष्ठसि॥
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अध्याय १० · श्लोक १७
कथं विद्यामहं योगिंस्त्वां सदा परिचिन्तयन्।केषु केषु च भावेषु चिन्त्योऽसि भगवन्मया॥
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अध्याय १० · श्लोक १८
विस्तरेणात्मनो योगं विभूतिं च जनार्दन ।भूयः कथय तृप्तिर्हि शृण्वतो नास्ति मेऽमृतम्॥
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अध्याय १० · श्लोक १९
हन्त ते कथयिष्यामि दिव्या ह्यात्मविभूतयः।प्राधान्यतः कुरुश्रेष्ठ नास्त्यन्तो विस्तरस्य मे॥
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अध्याय १० · श्लोक २०
अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः।अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव च॥
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अध्याय १० · श्लोक २१
आदित्यानामहं विष्णुर्ज्योतिषां रविरंशुमान्।मरीचिर्मरुतामस्मि नक्षत्राणामहं शशी॥
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अध्याय १० · श्लोक २२
वेदानां सामवेदोऽस्मि देवानामस्मि वासवः।इन्द्रियाणां मनश्चास्मि भूतानामस्मि चेतना॥
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अध्याय १० · श्लोक २३
रुद्राणां शङ्करश्चास्मि वित्तेशो यक्षरक्षसाम्।वसूनां पावकश्चास्मि मेरुः शिखरिणामहम्॥
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अध्याय १० · श्लोक २४
पुरोधसां च मुख्यं मां विद्धि पार्थ बृहस्पतिम्।सेनानीनामहं स्कन्दः सरसामस्मि सागरः॥
इस श्लोक की व्याख्या अभी लिखी जा रही है।
अध्याय १० · श्लोक २५
महर्षीणां भृगुरहं गिरामस्म्येकमक्षरम्।यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि स्थावराणां हिमालयः॥
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अध्याय १० · श्लोक २६
अश्वत्थः सर्ववृक्षाणां देवर्षीणां च नारदः।गन्धर्वाणां चित्ररथः सिद्धानां कपिलो मुनिः॥
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अध्याय १० · श्लोक २७
उच्चैःश्रवसमश्वानां विद्धि माममृतोद्भवम्।ऐरावतं गजेन्द्राणां नराणां च नराधिपम्॥
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अध्याय १० · श्लोक २८
आयुधानामहं वज्रं धेनूनामस्मि कामधुक्।प्रजनश्चास्मि कन्दर्पः सर्पाणामस्मि वासुकिः॥
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अध्याय १० · श्लोक २९
अनन्तश्चास्मि नागानां वरुणो यादसामहम् ।पितॄणामर्यमा चास्मि यमः संयमतामहम्॥
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अध्याय १० · श्लोक ३०
प्रह्लादश्चास्मि दैत्यानां कालः कलयतामहम्।मृगाणां च मृगेन्द्रोऽहं वैनतेयश्च पक्षिणाम्॥
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अध्याय १० · श्लोक ३१
पवनः पवतामस्मि रामः शस्त्रभृतामहम्।झषाणां मकरश्चास्मि स्रोतसामस्मि जाह्नवी॥
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अध्याय १० · श्लोक ३२
सर्गाणामादिरन्तश्च मध्यं चैवाहमर्जुन।अध्यात्मविद्या विद्यानां वादः प्रवदतामहम्॥
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अध्याय १० · श्लोक ३३
अक्षराणामकारोऽस्मि द्वन्द्वः सामासिकस्य च।अहमेवाक्षयः कालो धाताऽहं विश्वतोमुखः॥
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अध्याय १० · श्लोक ३४
मृत्युः सर्वहरश्चाहमुद्भवश्च भविष्यताम्।कीर्तिः श्रीर्वाक्च नारीणां स्मृतिर्मेधा धृतिः क्षमा॥
इस श्लोक की व्याख्या अभी लिखी जा रही है।
अध्याय १० · श्लोक ३५
बृहत्साम तथा साम्नां गायत्री छन्दसामहम्।मासानां मार्गशीर्षोऽहमृतूनां कुसुमाकरः॥
इस श्लोक की व्याख्या अभी लिखी जा रही है।
अध्याय १० · श्लोक ३६
द्यूतं छलयतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम्।जयोऽस्मि व्यवसायोऽस्मि सत्त्वं सत्त्ववतामहम्॥
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अध्याय १० · श्लोक ३७
वृष्णीनां वासुदेवोऽस्मि पाण्डवानां धनंजयः।मुनीनामप्यहं व्यासः कवीनामुशना कविः॥
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अध्याय १० · श्लोक ३८
दण्डो दमयतामस्मि नीतिरस्मि जिगीषताम्।मौनं चैवास्मि गुह्यानां ज्ञानं ज्ञानवतामहम्॥
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अध्याय १० · श्लोक ३९
यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन।न तदस्ति विना यत्स्यान्मया भूतं चराचरम्॥
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अध्याय १० · श्लोक ४०
नान्तोऽस्ति मम दिव्यानां विभूतीनां परंतप।एष तूद्देशतः प्रोक्तो विभूतेर्विस्तरो मया॥
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अध्याय १० · श्लोक ४१
यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा।तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंऽशसंभवम्॥
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अध्याय १० · श्लोक ४२
अथवा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन।विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत्॥
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