
अध्याय ९ / १८
खुला रहस्य
राजविद्याराजगुह्ययोगः
Rāja-vidyā-rāja-guhya Yoga · ३४ श्लोक
कृष्ण इसे सबसे सीधी और सबसे उदारता से दी गई शिक्षा कहते हैं। सब कुछ उनमें टिका है, फिर भी वे उसमें बँधे नहीं। और द्वार सबके लिए खुला है — एक पत्ता, एक फूल, या सच्चे मन से दिया गया जल ही पर्याप्त है।
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पुस्तक का सबसे समावेशी अध्याय। पहुँच जन्म, विद्या या कर्मकाण्ड पर नहीं, सच्चाई पर निर्भर हो जाती है।
श्लोक
संस्कृत पूर्ण · व्याख्या जारी हैअध्याय ९ · श्लोक १
इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे।ज्ञानं विज्ञानसहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्॥
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अध्याय ९ · श्लोक २
राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम्।प्रत्यक्षावगमं धर्म्यं सुसुखं कर्तुमव्ययम्॥
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अध्याय ९ · श्लोक ३
अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परन्तप।अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि॥
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अध्याय ९ · श्लोक ४
मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना।मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थितः॥
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अध्याय ९ · श्लोक ५
न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम्।भूतभृन्न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावनः॥
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अध्याय ९ · श्लोक ६
यथाऽऽकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान्।तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय॥
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अध्याय ९ · श्लोक ७
सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम्।कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम्॥
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अध्याय ९ · श्लोक ८
प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः।भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात्॥
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अध्याय ९ · श्लोक ९
न च मां तानि कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय।उदासीनवदासीनमसक्तं तेषु कर्मसु॥
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अध्याय ९ · श्लोक १०
मयाऽध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम्।हेतुनाऽनेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते॥
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अध्याय ९ · श्लोक ११
अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम्।परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम्॥
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अध्याय ९ · श्लोक १२
मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः।राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः॥
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अध्याय ९ · श्लोक १३
महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः।भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम्॥
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अध्याय ९ · श्लोक १४
सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढव्रताः।नमस्यन्तश्च मां भक्त्या नित्ययुक्ता उपासते॥
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अध्याय ९ · श्लोक १५
ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये यजन्तो मामुपासते।एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतोमुखम्॥
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अध्याय ९ · श्लोक १६
अहं क्रतुरहं यज्ञः स्वधाऽहमहमौषधम्।मंत्रोऽहमहमेवाज्यमहमग्निरहं हुतम्॥
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अध्याय ९ · श्लोक १७
पिताऽहमस्य जगतो माता धाता पितामहः।वेद्यं पवित्रमोंकार ऋक् साम यजुरेव च॥
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अध्याय ९ · श्लोक १८
गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत्।प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम्॥
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अध्याय ९ · श्लोक १९
तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्णाम्युत्सृजामि च।अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन॥
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अध्याय ९ · श्लोक २०
त्रैविद्या मां सोमपाः पूतपापा यज्ञैरिष्ट्वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते।ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोक मश्नन्ति दिव्यान्दिवि देवभोगान्॥
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अध्याय ९ · श्लोक २१
ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति ।एवं त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना गतागतं कामकामा लभन्ते॥
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अध्याय ९ · श्लोक २२
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥
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अध्याय ९ · श्लोक २३
येऽप्यन्यदेवता भक्ता यजन्ते श्रद्धयाऽन्विताः।तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम्॥
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अध्याय ९ · श्लोक २४
अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च।न तु मामभिजानन्ति तत्त्वेनातश्च्यवन्ति ते॥
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अध्याय ९ · श्लोक २५
यान्ति देवव्रता देवान्पितॄन्यान्ति पितृव्रताः ।भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपि माम्॥
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अध्याय ९ · श्लोक २६
पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति।तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः॥
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अध्याय ९ · श्लोक २७
यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत्।यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम्॥
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अध्याय ९ · श्लोक २८
शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्यसे कर्मबन्धनैः।संन्यासयोगयुक्तात्मा विमुक्तो मामुपैष्यसि॥
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अध्याय ९ · श्लोक २९
समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः।ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम्॥
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अध्याय ९ · श्लोक ३०
अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्।साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः॥
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अध्याय ९ · श्लोक ३१
क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति।कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति॥
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अध्याय ९ · श्लोक ३२
मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः।स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम्॥
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अध्याय ९ · श्लोक ३३
किं पुनर्ब्राह्मणाः पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा।अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम्॥
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अध्याय ९ · श्लोक ३४
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः॥
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