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सम्पूर्ण को देखना - Kangra miniature

अध्याय ११ / १८

सम्पूर्ण को देखना

विश्वरूपदर्शनयोगः

Viśvarūpa-darśana Yoga · ५५ श्लोक

अर्जुन इसे प्रत्यक्ष देखना चाहता है। उसे वैसी दृष्टि दी जाती है, और जो वह देखता है वह सुखद नहीं: एक साथ सारे लोक और सारे प्राणी, और काल स्वयं सब कुछ निगलता हुआ। वह भयभीत होकर वही परिचित रूप लौटाने की विनती करता है।

यह अध्याय आपको कहाँ छोड़ता है

पुस्तक का भावनात्मक शिखर। अर्जुन को ठीक वही मिलता है जो उसने माँगा था, और वह जान जाता है कि पूरा सत्य मनुष्य के सँभाले से बाहर है।

श्लोक

५५ / ५५ का अर्थ