
अध्याय ११ / १८
सम्पूर्ण को देखना
विश्वरूपदर्शनयोगः
Viśvarūpa-darśana Yoga · ५५ श्लोक
अर्जुन इसे प्रत्यक्ष देखना चाहता है। उसे वैसी दृष्टि दी जाती है, और जो वह देखता है वह सुखद नहीं: एक साथ सारे लोक और सारे प्राणी, और काल स्वयं सब कुछ निगलता हुआ। वह भयभीत होकर वही परिचित रूप लौटाने की विनती करता है।
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पुस्तक का भावनात्मक शिखर। अर्जुन को ठीक वही मिलता है जो उसने माँगा था, और वह जान जाता है कि पूरा सत्य मनुष्य के सँभाले से बाहर है।
श्लोक
संस्कृत पूर्ण · व्याख्या जारी हैअध्याय ११ · श्लोक १
मदनुग्रहाय परमं गुह्यमध्यात्मसंज्ञितम्।यत्त्वयोक्तं वचस्तेन मोहोऽयं विगतो मम॥
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अध्याय ११ · श्लोक २
भवाप्ययौ हि भूतानां श्रुतौ विस्तरशो मया।त्वत्तः कमलपत्राक्ष माहात्म्यमपि चाव्ययम्॥
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अध्याय ११ · श्लोक ३
एवमेतद्यथात्थ त्वमात्मानं परमेश्वर।द्रष्टुमिच्छामि ते रूपमैश्वरं पुरुषोत्तम॥
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अध्याय ११ · श्लोक ४
मन्यसे यदि तच्छक्यं मया द्रष्टुमिति प्रभो।योगेश्वर ततो मे त्वं दर्शयाऽत्मानमव्ययम्॥
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अध्याय ११ · श्लोक ५
पश्य मे पार्थ रूपाणि शतशोऽथ सहस्रशः।नानाविधानि दिव्यानि नानावर्णाकृतीनि च॥
इस श्लोक की व्याख्या अभी लिखी जा रही है।
अध्याय ११ · श्लोक ६
पश्यादित्यान्वसून्रुद्रानश्विनौ मरुतस्तथा ।बहून्यदृष्टपूर्वाणि पश्याश्चर्याणि भारत॥
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अध्याय ११ · श्लोक ७
इहैकस्थं जगत्कृत्स्नं पश्याद्य सचराचरम्।मम देहे गुडाकेश यच्चान्यद्द्रष्टुमिच्छसि॥
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अध्याय ११ · श्लोक ८
न तु मां शक्यसे द्रष्टुमनेनैव स्वचक्षुषा।दिव्यं ददामि ते चक्षुः पश्य मे योगमैश्वरम्॥
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अध्याय ११ · श्लोक ९
एवमुक्त्वा ततो राजन्महायोगेश्वरो हरिः।दर्शयामास पार्थाय परमं रूपमैश्वरम्॥
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अध्याय ११ · श्लोक १०
अनेकवक्त्रनयनमनेकाद्भुतदर्शनम्।अनेकदिव्याभरणं दिव्यानेकोद्यतायुधम्॥
इस श्लोक की व्याख्या अभी लिखी जा रही है।
अध्याय ११ · श्लोक ११
दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धानुलेपनम्।सर्वाश्चर्यमयं देवमनन्तं विश्वतोमुखम्॥
इस श्लोक की व्याख्या अभी लिखी जा रही है।
अध्याय ११ · श्लोक १२
दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता।यदि भाः सदृशी सा स्याद्भासस्तस्य महात्मनः॥
इस श्लोक की व्याख्या अभी लिखी जा रही है।
अध्याय ११ · श्लोक १३
तत्रैकस्थं जगत्कृत्स्नं प्रविभक्तमनेकधा।अपश्यद्देवदेवस्य शरीरे पाण्डवस्तदा॥
इस श्लोक की व्याख्या अभी लिखी जा रही है।
अध्याय ११ · श्लोक १४
ततः स विस्मयाविष्टो हृष्टरोमा धनञ्जयः।प्रणम्य शिरसा देवं कृताञ्जलिरभाषत॥
इस श्लोक की व्याख्या अभी लिखी जा रही है।
अध्याय ११ · श्लोक १५
पश्यामि देवांस्तव देव देहे सर्वांस्तथा भूतविशेषसङ्घान्।ब्रह्माणमीशं कमलासनस्थ मृषींश्च सर्वानुरगांश्च दिव्यान्॥
इस श्लोक की व्याख्या अभी लिखी जा रही है।
अध्याय ११ · श्लोक १६
अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रं पश्यामि त्वां सर्वतोऽनन्तरूपम्।नान्तं न मध्यं न पुनस्तवादिं पश्यामि विश्वेश्वर विश्वरूप॥
इस श्लोक की व्याख्या अभी लिखी जा रही है।
अध्याय ११ · श्लोक १७
किरीटिनं गदिनं चक्रिणं च तेजोराशिं सर्वतोदीप्तिमन्तम्।पश्यामि त्वां दुर्निरीक्ष्यं समन्ता द्दीप्तानलार्कद्युतिमप्रमेयम्॥
इस श्लोक की व्याख्या अभी लिखी जा रही है।
अध्याय ११ · श्लोक १८
त्वमक्षरं परमं वेदितव्यं त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्।त्वमव्ययः शाश्वतधर्मगोप्ता सनातनस्त्वं पुरुषो मतो मे॥
इस श्लोक की व्याख्या अभी लिखी जा रही है।
अध्याय ११ · श्लोक १९
अनादिमध्यान्तमनन्तवीर्य मनन्तबाहुं शशिसूर्यनेत्रम्।पश्यामि त्वां दीप्तहुताशवक्त्रम् स्वतेजसा विश्वमिदं तपन्तम्॥
इस श्लोक की व्याख्या अभी लिखी जा रही है।
अध्याय ११ · श्लोक २०
द्यावापृथिव्योरिदमन्तरं हि व्याप्तं त्वयैकेन दिशश्च सर्वाः।दृष्ट्वाऽद्भुतं रूपमुग्रं तवेदं लोकत्रयं प्रव्यथितं महात्मन्॥
इस श्लोक की व्याख्या अभी लिखी जा रही है।
अध्याय ११ · श्लोक २१
अमी हि त्वां सुरसङ्घा विशन्ति केचिद्भीताः प्राञ्जलयो गृणन्ति ।स्वस्तीत्युक्त्वा महर्षिसिद्धसङ्घाः स्तुवन्ति त्वां स्तुतिभिः पुष्कलाभिः॥
इस श्लोक की व्याख्या अभी लिखी जा रही है।
अध्याय ११ · श्लोक २२
रुद्रादित्या वसवो ये च साध्या विश्वेऽश्विनौ मरुतश्चोष्मपाश्च ।गन्धर्वयक्षासुरसिद्धसङ्घा वीक्षन्ते त्वां विस्मिताश्चैव सर्वे॥
इस श्लोक की व्याख्या अभी लिखी जा रही है।
अध्याय ११ · श्लोक २३
रूपं महत्ते बहुवक्त्रनेत्रं महाबाहो बहुबाहूरुपादम्।बहूदरं बहुदंष्ट्राकरालं दृष्ट्वा लोकाः प्रव्यथितास्तथाऽहम्॥
इस श्लोक की व्याख्या अभी लिखी जा रही है।
अध्याय ११ · श्लोक २४
नभःस्पृशं दीप्तमनेकवर्णं व्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम्।दृष्ट्वा हि त्वां प्रव्यथितान्तरात्मा धृतिं न विन्दामि शमं च विष्णो॥
इस श्लोक की व्याख्या अभी लिखी जा रही है।
अध्याय ११ · श्लोक २५
दंष्ट्राकरालानि च ते मुखानि दृष्ट्वैव कालानलसन्निभानि।दिशो न जाने न लभे च शर्म प्रसीद देवेश जगन्निवास॥
इस श्लोक की व्याख्या अभी लिखी जा रही है।
अध्याय ११ · श्लोक २६
अमी च त्वां धृतराष्ट्रस्य पुत्राः सर्वे सहैवावनिपालसङ्घैः।भीष्मो द्रोणः सूतपुत्रस्तथाऽसौ सहास्मदीयैरपि योधमुख्यैः॥
इस श्लोक की व्याख्या अभी लिखी जा रही है।
अध्याय ११ · श्लोक २७
वक्त्राणि ते त्वरमाणा विशन्ति दंष्ट्राकरालानि भयानकानि।केचिद्विलग्ना दशनान्तरेषु संदृश्यन्ते चूर्णितैरुत्तमाङ्गैः॥
इस श्लोक की व्याख्या अभी लिखी जा रही है।
अध्याय ११ · श्लोक २८
यथा नदीनां बहवोऽम्बुवेगाः समुद्रमेवाभिमुखा द्रवन्ति ।तथा तवामी नरलोकवीरा विशन्ति वक्त्राण्यभिविज्वलन्ति॥
इस श्लोक की व्याख्या अभी लिखी जा रही है।
अध्याय ११ · श्लोक २९
यथा प्रदीप्तं ज्वलनं पतङ्गा विशन्ति नाशाय समृद्धवेगाः।तथैव नाशाय विशन्ति लोका स्तवापि वक्त्राणि समृद्धवेगाः॥
इस श्लोक की व्याख्या अभी लिखी जा रही है।
अध्याय ११ · श्लोक ३०
लेलिह्यसे ग्रसमानः समन्ता ल्लोकान्समग्रान्वदनैर्ज्वलद्भिः।तेजोभिरापूर्य जगत्समग्रं भासस्तवोग्राः प्रतपन्ति विष्णो॥
इस श्लोक की व्याख्या अभी लिखी जा रही है।
अध्याय ११ · श्लोक ३१
आख्याहि मे को भवानुग्ररूपो नमोऽस्तु ते देववर प्रसीद।विज्ञातुमिच्छामि भवन्तमाद्यं न हि प्रजानामि तव प्रवृत्तिम्॥
इस श्लोक की व्याख्या अभी लिखी जा रही है।
अध्याय ११ · श्लोक ३२
कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः।ऋतेऽपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे येऽवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः॥
इस श्लोक की व्याख्या अभी लिखी जा रही है।
अध्याय ११ · श्लोक ३३
तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व जित्वा शत्रून् भुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम्।मयैवैते निहताः पूर्वमेव निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्॥
इस श्लोक की व्याख्या अभी लिखी जा रही है।
अध्याय ११ · श्लोक ३४
द्रोणं च भीष्मं च जयद्रथं च कर्णं तथाऽन्यानपि योधवीरान्।मया हतांस्त्वं जहि मा व्यथिष्ठा युध्यस्व जेतासि रणे सपत्नान्॥
इस श्लोक की व्याख्या अभी लिखी जा रही है।
अध्याय ११ · श्लोक ३५
एतच्छ्रुत्वा वचनं केशवस्य कृताञ्जलिर्वेपमानः किरीटी।नमस्कृत्वा भूय एवाह कृष्णं सगद्गदं भीतभीतः प्रणम्य॥
इस श्लोक की व्याख्या अभी लिखी जा रही है।
अध्याय ११ · श्लोक ३६
स्थाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्या जगत् प्रहृष्यत्यनुरज्यते च।रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसङ्घाः॥
इस श्लोक की व्याख्या अभी लिखी जा रही है।
अध्याय ११ · श्लोक ३७
कस्माच्च ते न नमेरन्महात्मन् गरीयसे ब्रह्मणोऽप्यादिकर्त्रे।अनन्त देवेश जगन्निवास त्वमक्षरं सदसत्तत्परं यत्॥
इस श्लोक की व्याख्या अभी लिखी जा रही है।
अध्याय ११ · श्लोक ३८
त्वमादिदेवः पुरुषः पुराण स्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्।वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम त्वया ततं विश्वमनन्तरूप॥
इस श्लोक की व्याख्या अभी लिखी जा रही है।
अध्याय ११ · श्लोक ३९
वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशाङ्कः प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च।नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते॥
इस श्लोक की व्याख्या अभी लिखी जा रही है।
अध्याय ११ · श्लोक ४०
नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व।अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः॥
इस श्लोक की व्याख्या अभी लिखी जा रही है।
अध्याय ११ · श्लोक ४१
सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं हे कृष्ण हे यादव हे सखेति।अजानता महिमानं तवेदं मया प्रमादात्प्रणयेन वापि॥
इस श्लोक की व्याख्या अभी लिखी जा रही है।
अध्याय ११ · श्लोक ४२
यच्चावहासार्थमसत्कृतोऽसि विहारशय्यासनभोजनेषु।एकोऽथवाप्यच्युत तत्समक्षं तत्क्षामये त्वामहमप्रमेयम्॥
इस श्लोक की व्याख्या अभी लिखी जा रही है।
अध्याय ११ · श्लोक ४३
पितासि लोकस्य चराचरस्य त्वमस्य पूज्यश्च गुरुर्गरीयान्।न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिकः कुतोऽन्यो लोकत्रयेऽप्यप्रतिमप्रभाव॥
इस श्लोक की व्याख्या अभी लिखी जा रही है।
अध्याय ११ · श्लोक ४४
तस्मात्प्रणम्य प्रणिधाय कायं प्रसादये त्वामहमीशमीड्यम्।पितेव पुत्रस्य सखेव सख्युः प्रियः प्रियायार्हसि देव सोढुम्॥
इस श्लोक की व्याख्या अभी लिखी जा रही है।
अध्याय ११ · श्लोक ४५
अदृष्टपूर्वं हृषितोऽस्मि दृष्ट्वा भयेन च प्रव्यथितं मनो मे।तदेव मे दर्शय देव रूपं प्रसीद देवेश जगन्निवास॥
इस श्लोक की व्याख्या अभी लिखी जा रही है।
अध्याय ११ · श्लोक ४६
किरीटिनं गदिनं चक्रहस्त मिच्छामि त्वां द्रष्टुमहं तथैव।तेनैव रूपेण चतुर्भुजेन सहस्रबाहो भव विश्वमूर्ते॥
इस श्लोक की व्याख्या अभी लिखी जा रही है।
अध्याय ११ · श्लोक ४७
मया प्रसन्नेन तवार्जुनेदं रूपं परं दर्शितमात्मयोगात्।तेजोमयं विश्वमनन्तमाद्यं यन्मे त्वदन्येन न दृष्टपूर्वम्॥
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अध्याय ११ · श्लोक ४८
न वेदयज्ञाध्ययनैर्न दानै र्न च क्रियाभिर्न तपोभिरुग्रैः।एवंरूपः शक्य अहं नृलोके द्रष्टुं त्वदन्येन कुरुप्रवीर॥
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अध्याय ११ · श्लोक ४९
मा ते व्यथा मा च विमूढभावो दृष्ट्वा रूपं घोरमीदृङ्ममेदम्।व्यपेतभीः प्रीतमनाः पुनस्त्वं तदेव मे रूपमिदं प्रपश्य॥
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अध्याय ११ · श्लोक ५०
इत्यर्जुनं वासुदेवस्तथोक्त्वा स्वकं रूपं दर्शयामास भूयः।आश्वासयामास च भीतमेनं भूत्वा पुनः सौम्यवपुर्महात्मा॥
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अध्याय ११ · श्लोक ५१
दृष्ट्वेदं मानुषं रूपं तवसौम्यं जनार्दन।इदानीमस्मि संवृत्तः सचेताः प्रकृतिं गतः॥
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अध्याय ११ · श्लोक ५२
सुदुर्दर्शमिदं रूपं दृष्टवानसि यन्मम।देवा अप्यस्य रूपस्य नित्यं दर्शनकाङ्क्षिणः॥
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अध्याय ११ · श्लोक ५३
नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया।शक्य एवंविधो द्रष्टुं दृष्टवानसि मां यथा॥
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अध्याय ११ · श्लोक ५४
भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन ।ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परन्तप॥
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अध्याय ११ · श्लोक ५५
मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः सङ्गवर्जितः।निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डव॥
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