Gita Explained
अर्जुन कहते हैं12.1

एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते।येचाप्यक्षरमव्यक्तं तेषां के योगवित्तमाः॥

evaṃ satata-yuktā ye bhaktās tvāṃ paryupāsateye cāpy akṣaram avyaktaṃ teṣāṃ ke yoga-vittamāḥ

शब्दार्थ
arjunaḥ uvāca — Arjun saidevam — thussatata — steadfastlyyuktāḥ — devotedye — thosebhaktāḥ — devoteestvām — youparyupāsate — worshipye — thoseca — andapi — alsoakṣaram — the imperishableavyaktam — the formless Brahmanteṣām — of themke — whoyoga-vit-tamāḥ — more perfect in Yog

श्लोक कहता है

अर्जुन ने कहा: कुछ लोग निरन्तर आपकी उपासना करते हैं, भक्ति से आपसे जुड़े हुए। और कुछ उस अक्षर अव्यक्त की उपासना करते हैं। इनमें से कौन योग को बेहतर जानता है?

सरल शब्दों में

दर्शन के बाद एक व्यावहारिक सवाल।

वह अभी-अभी असीम रूप देख चुका है और उसने जाना-पहचाना रूप वापस माँगा है। अब वह सीधे पूछता है कि सही रास्ता कौन-सा है।

पिछले अध्याय के बाद हर पाठक के हाथ में यही सवाल रह जाता है।

आपने इसे कहाँ महसूस किया है

दो लोग एक ही विषय सीख रहे हैं। एक सवाल हल करती रहती है जब तक तरीक़ा उसके हाथ में न आ जाए। दूसरी उसके आसपास पढ़ती रहती है जब तक वह बता न सके कि तरीक़ा काम क्यों करता है। दोनों मन ही मन मानती हैं कि दूसरी ने आसान रास्ता चुना, और दोनों ने यह कभी कहा नहीं।

और गहराई में

दो अच्छे रास्तों में कौन बेहतर है, यह पूछना जितना लगता है उससे ज़्यादा काम का सवाल है, क्योंकि ईमानदार उत्तर शायद ही वह होता है जिसकी लोग उम्मीद करते हैं।

अर्जुन यूँ ही नहीं पूछ रहा। अध्याय ११ ने उसे निराकार पूरी ताक़त में दिया और वह उसमें ठहर नहीं सका; उसने चतुर्भुज रूप वापस माँगा और बिना किसी टिप्पणी के पा लिया। तो सवाल निजी है। वह जानना चाहता है कि जो उसने अभी किया, वह पीछे हटना था या नहीं।

अगले चार श्लोकों में उत्तर इस पुस्तक के हिसाब से असामान्य रूप से सीधा है।

और सवाल का ढंग नक़ल करने लायक़ है। वह यह नहीं पूछता कि ज़्यादा सच कौन-सा है। वह पूछता है कि लोगों के लिए चलता कौन-सा है, और वह अलग सवाल निकलता है जिसका अलग उत्तर है।