Gita Explained
अर्जुन कहते हैं13.1

प्रकृतिं पुरुषं चैव क्षेत्रं क्षेत्रज्ञमेव च।एतद्वेदितुमिच्छामि ज्ञानं ज्ञेयं च केशव॥

prakṛtiṃ puruṣaṃ caiva kṣetraṃ kṣetra-jñam eva caetad veditum icchāmi jñānaṃ jñeyaṃ ca keśava

शब्दार्थ
arjunaḥ uvāca — Arjun saidprakṛtim — material naturepuruṣam — the enjoyerca — andeva — indeedkṣetram — the field of activitieskṣetra-jñam — the knower of the fieldeva — evenca — alsoetat — thisveditum — to knowicchāmi — I wishjñānam — knowledgejñeyam — the goal of knowledgeca — andkeśava — Krishna, the killer of the demon named Keshi

श्लोक कहता है

अर्जुन ने कहा: प्रकृति और पुरुष, क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ, ज्ञान और ज्ञेय। केशव, मैं इन्हें समझना चाहता हूँ।

सरल शब्दों में

तीन जोड़ियाँ, जोड़ियों की तरह ही गिनाई हुईं।

अर्जुन इस बार शिक्षा नहीं माँग रहा। वह शब्दावली माँग रहा है।

और ठीक माँग रहा है। आगे का अध्याय पुस्तक का सबसे तकनीकी है, और ये छह शब्द ही उसकी पूरी मशीनरी हैं।

आपने इसे कहाँ महसूस किया है

आप किसी के साथ बैठकर समझना चाहते हैं कि आपकी अपनी पेंशन कैसे चलती है, और पहली बात यही पूछते हैं कि काग़ज़ पर लिखे चार शब्दों का मतलब क्या है। इसलिए नहीं कि आपको भाषण चाहिए। इसलिए कि उसके बाद का हर वाक्य उन्हीं पर टिका है, और सिर हिलाते रहने से दोपहर बेकार जाएगी।

और गहराई में

किसी बहस से पहले परिभाषाएँ माँग लेना सबसे किफ़ायती काम है जो कोई शिष्य कर सकता है, और अर्जुन ने यह करना सीख लिया है।

उसने अध्याय ८ की शुरुआत में भी यही किया था, कृष्ण के बरते पारिभाषिक शब्द गिनाकर पूछा था कि हर एक का क्या अर्थ है। यहाँ वह एक क़दम आगे जाकर उन्हें पहले से माँग लेता है। तीन जोड़ियाँ, और हर एक एक ही भेद को अलग कोण से नाम देती है।

अध्याय शुरू होने से पहले यह जान लेना काम का है। प्रकृति और पुरुष, क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ, ज्ञान और ज्ञेय — ये छह विषय नहीं हैं।

ये एक ही रेखा है, तीन बार खींची हुई, जो देखी जाने वाली चीज़ और देखने वाले के बीच पड़ती है। आगे के चौंतीस श्लोकों की हर चीज़ इस रेखा के इस या उस तरफ़ बैठती है, और जो पाठक इसे थामे रखेगा वह भटकेगा नहीं।