Gita Explained
कृष्ण कहते हैं13.35

क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरेवमन्तरं ज्ञानचक्षुषा।भूतप्रकृतिमोक्षं च ये विदुर्यान्ति ते परम्॥

kṣetra-kṣetrajñayor evam antaraṃ jñāna-cakṣuṣābhūta-prakṛti-mokṣaṃ ca ye vidur yānti te param

शब्दार्थ
kṣetra — the bodykṣetra-jñayoḥ — of the knower of the bodyevam — thusantaram — the differencejñāna-cakṣuṣā — with the eyes of knowledgebhūta — the living entityprakṛti-mokṣam — release from material natureca — andye — whoviduḥ — knowyānti — approachte — theyparam — the Supreme

श्लोक कहता है

जो ज्ञान की आँख से क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का भेद जान लेते हैं। और प्राणियों का प्रकृति से छूटना भी। वे परम तक पहुँचते हैं।

सरल शब्दों में

ज्ञानचक्षुषा — ज्ञान की आँख से।

तर्क से नहीं, हालाँकि अध्याय ने तर्क ख़ूब किया है। आँख। वह चीज़ जिससे देखा जाता है।

जो अध्याय परिभाषाएँ माँगने से शुरू हुआ था वह देखने के एक ढंग का वर्णन करके ख़त्म होता है।

आपने इसे कहाँ महसूस किया है

आपकी दादी कमरे के उस पार से बता देती हैं कि आपके साथ कुछ ठीक नहीं है, इससे पहले कि आपने कुछ कहा हो, और वे सही होती हैं। वे अनुमान नहीं लगा रहीं। चालीस साल लोगों को देखने से एक आँख बन गई है, और वह आँख सोचने से पहले काम कर लेती है।

और गहराई में

तर्क के बजाय एक आँख पर ख़त्म होना बता देता है कि पिछले चौंतीस श्लोक किसलिए थे।

अध्याय ने एक फ़ेहरिस्त दी, बीस गुण, कुछ विरोधाभास और प्रकृति तथा पुरुष के बीच काम का सावधान बँटवारा। इनमें से कुछ भी मंज़िल नहीं था। वह जिस ओर बढ़ रहा था वह देखने का ऐसा ढंग है जिसमें क्षेत्र और उसके जानने वाले का भेद बस दिख जाए, जैसे सधी हुई आँख वह चीज़ देख लेती है जिसे बिना सधी आँख सीधे अनदेखा कर देती है।

अध्याय ११ ने यही बात दूसरी तरफ़ से कही थी, जब अर्जुन को कुछ भी देखने से पहले एक आँख देनी पड़ी थी।

तो इस अध्याय ने काम किया या नहीं, इसकी ईमानदार कसौटी यह नहीं कि आप क्षेत्र की परिभाषा दे सकते हैं या नहीं। कसौटी यह है कि अगली बार जब कोई मनोदशा आए, तो आपके भीतर कुछ उसे क्षेत्र का मौसम मानकर दर्ज करता है या अपने होने के बारे में ख़बर मानकर।