
अध्याय १४ / १८
तीन गुण
गुणत्रयविभागयोगः
Guṇa-traya-vibhāga Yoga · २७ श्लोक
प्रकृति में सब कुछ तीन गुणों से बुना है: प्रकाश, गति और जड़ता। ये अच्छे लोगों को भी बाँधते हैं, और बारी-बारी से हावी होते हैं। कृष्ण बताते हैं कि इस समय आप पर कौन-सा गुण हावी है यह कैसे पहचानें, और किसी से भी न खिंचना कैसा होता है।
यह अध्याय आपको कहाँ छोड़ता है
मनोदशा और स्वभाव का एक कार्यसाधक मानचित्र। पाठक को अपनी स्थिति देखने का ढंग मिलता है, बिना उसके वश में हुए।
श्लोक
संस्कृत पूर्ण · व्याख्या जारी हैअध्याय १४ · श्लोक १
परं भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम्।यज्ज्ञात्वा मुनयः सर्वे परां सिद्धिमितो गताः॥
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अध्याय १४ · श्लोक २
इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः।सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च॥
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अध्याय १४ · श्लोक ३
मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन् गर्भं दधाम्यहम्।संभवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत॥
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अध्याय १४ · श्लोक ४
सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः सम्भवन्ति याः।तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता॥
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अध्याय १४ · श्लोक ५
सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसंभवाः।निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम्॥
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अध्याय १४ · श्लोक ६
तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात्प्रकाशकमनामयम्।सुखसङ्गेन बध्नाति ज्ञानसङ्गेन चानघ॥
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अध्याय १४ · श्लोक ७
रजो रागात्मकं विद्धि तृष्णासङ्गसमुद्भवम्।तन्निबध्नाति कौन्तेय कर्मसङ्गेन देहिनम्॥
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अध्याय १४ · श्लोक ८
तमस्त्वज्ञानजं विद्धि मोहनं सर्वदेहिनाम्।प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्निबध्नाति भारत॥
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अध्याय १४ · श्लोक ९
सत्त्वं सुखे सञ्जयति रजः कर्मणि भारत।ज्ञानमावृत्य तु तमः प्रमादे सञ्जयत्युत॥
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अध्याय १४ · श्लोक १०
रजस्तमश्चाभिभूय सत्त्वं भवति भारत।रजः सत्त्वं तमश्चैव तमः सत्त्वं रजस्तथा॥
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अध्याय १४ · श्लोक ११
सर्वद्वारेषु देहेऽस्मिन्प्रकाश उपजायते।ज्ञानं यदा तदा विद्याद्विवृद्धं सत्त्वमित्युत॥
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अध्याय १४ · श्लोक १२
लोभः प्रवृत्तिरारम्भः कर्मणामशमः स्पृहा।रजस्येतानि जायन्ते विवृद्धे भरतर्षभ॥
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अध्याय १४ · श्लोक १३
अप्रकाशोऽप्रवृत्तिश्च प्रमादो मोह एव च।तमस्येतानि जायन्ते विवृद्धे कुरुनन्दन॥
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अध्याय १४ · श्लोक १४
यदा सत्त्वे प्रवृद्धे तु प्रलयं याति देहभृत्।तदोत्तमविदां लोकानमलान्प्रतिपद्यते॥
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अध्याय १४ · श्लोक १५
रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसङ्गिषु जायते।तथा प्रलीनस्तमसि मूढयोनिषु जायते॥
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अध्याय १४ · श्लोक १६
कर्मणः सुकृतस्याहुः सात्त्विकं निर्मलं फलम्।रजसस्तु फलं दुःखमज्ञानं तमसः फलम्॥
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अध्याय १४ · श्लोक १७
सत्त्वात्सञ्जायते ज्ञानं रजसो लोभ एव च।प्रमादमोहौ तमसो भवतोऽज्ञानमेव च॥
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अध्याय १४ · श्लोक १८
ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः।जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः॥
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अध्याय १४ · श्लोक १९
नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति।गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोऽधिगच्छति॥
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अध्याय १४ · श्लोक २०
गुणानेतानतीत्य त्रीन्देही देहसमुद्भवान्।जन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तोऽमृतमश्नुते॥
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अध्याय १४ · श्लोक २१
कैर्लिंगैस्त्रीन्गुणानेतानतीतो भवति प्रभो।किमाचारः कथं चैतांस्त्रीन्गुणानतिवर्तते॥
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अध्याय १४ · श्लोक २२
प्रकाशं च प्रवृत्तिं च मोहमेव च पाण्डव।न द्वेष्टि सम्प्रवृत्तानि न निवृत्तानि काङ्क्षति॥
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अध्याय १४ · श्लोक २३
उदासीनवदासीनो गुणैर्यो न विचाल्यते।गुणा वर्तन्त इत्येव योऽवतिष्ठति नेङ्गते॥
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अध्याय १४ · श्लोक २४
समदुःखसुखः स्वस्थः समलोष्टाश्मकाञ्चनः।तुल्यप्रियाप्रियो धीरस्तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः॥
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अध्याय १४ · श्लोक २५
मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयोः।सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीतः स उच्यते॥
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अध्याय १४ · श्लोक २६
मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते ।स गुणान्समतीत्यैतान्ब्रह्मभूयाय कल्पते॥
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अध्याय १४ · श्लोक २७
ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाऽहममृतस्याव्ययस्य च।शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च॥
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