Gita Explained
पुरुषोत्तम — Kangra miniature

अध्याय १५ / १८

पुरुषोत्तम

पुरुषोत्तमयोगः

Puruṣottama Yoga · २० श्लोक

एक उलटा वृक्ष, जड़ें आकाश में और शाखाएँ नीचे — इस संसार का चित्र जिसमें हम रहते हैं। कृष्ण कहते हैं कि इस पर कुल्हाड़ी चलाओ — संसार पर नहीं, बल्कि उस आसक्ति पर जो आपको उसकी शाखाओं में लटकाए रखती है।

यह अध्याय आपको कहाँ छोड़ता है

गीता के तत्त्वदर्शन का सबसे संक्षिप्त पूर्ण कथन, जिसका अन्त उस पर होता है जो नाशवान और अविनाशी दोनों से ऊपर है।

श्लोक

संस्कृत पूर्ण · व्याख्या जारी है
  • अध्याय १५ · श्लोक

    ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्।छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्॥

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  • अध्याय १५ · श्लोक

    अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः।अधश्च मूलान्यनुसन्ततानि कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके॥

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  • अध्याय १५ · श्लोक

    न रूपमस्येह तथोपलभ्यते नान्तो न चादिर्न च संप्रतिष्ठा।अश्वत्थमेनं सुविरूढमूल मसङ्गशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा॥

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  • अध्याय १५ · श्लोक

    ततः पदं तत्परिमार्गितव्यं यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः ।तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये ।यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी॥

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  • अध्याय १५ · श्लोक

    निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः।द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसंज्ञै र्गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत्॥

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  • अध्याय १५ · श्लोक

    न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः।यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम॥

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  • अध्याय १५ · श्लोक

    ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः।मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति॥

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  • अध्याय १५ · श्लोक

    शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतीश्वरः।गृहीत्वैतानि संयाति वायुर्गन्धानिवाशयात्॥

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  • अध्याय १५ · श्लोक

    श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च।अधिष्ठाय मनश्चायं विषयानुपसेवते॥

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  • अध्याय १५ · श्लोक १०

    उत्क्रामन्तं स्थितं वापि भुञ्जानं वा गुणान्वितम्।विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषः॥

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  • अध्याय १५ · श्लोक ११

    यतन्तो योगिनश्चैनं पश्यन्त्यात्मन्यवस्थितम्।यतन्तोऽप्यकृतात्मानो नैनं पश्यन्त्यचेतसः॥

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  • अध्याय १५ · श्लोक १२

    यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेऽखिलम्।यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम्॥

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  • अध्याय १५ · श्लोक १३

    गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा।पुष्णामि चौषधीः सर्वाः सोमो भूत्वा रसात्मकः॥

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  • अध्याय १५ · श्लोक १४

    अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः।प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम्॥

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  • अध्याय १५ · श्लोक १५

    सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च।वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम्॥

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  • अध्याय १५ · श्लोक १६

    द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च।क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते॥

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  • अध्याय १५ · श्लोक १७

    उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः।यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः॥

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  • अध्याय १५ · श्लोक १८

    यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः।अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः॥

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  • अध्याय १५ · श्लोक १९

    यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम्।स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत॥

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  • अध्याय १५ · श्लोक २०

    इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयाऽनघ।एतद्बुद्ध्वा बुद्धिमान्स्यात्कृतकृत्यश्च भारत॥

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