Gita Explained
कृष्ण कहते हैं7.30

साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञं च ये विदुः।प्रयाणकालेऽपि च मां ते विदुर्युक्तचेतसः॥

sādhibhūtādhidaivaṃ māṃ sādhiyajñaṃ ca ye viduḥprayāṇa-kāle ’pi ca māṃ te vidur yukta-cetasaḥ

शब्दार्थ
sa-adhibhūta — governing principle of the field of matteradhidaivam — governing principle of the celestial godsmām — mesa-adhiyajñam — governing principle of the Lord all sacrificial performancesca — andye — whoviduḥ — knowprayāṇa — of deathkāle — at the timeapi — evenca — andmām — mete — theyviduḥ — knowyukta-cetasaḥ — in full consciousness of me

श्लोक कहता है

कुछ लोग मुझे पदार्थ के पीछे, देवताओं के पीछे और यज्ञ के पीछे खड़ा जानते हैं। वे मुझे जाने के समय भी जानते हैं, मन मुझसे जुड़ा हुआ।

सरल शब्दों में

एक पंक्ति में तीन पारिभाषिक शब्द, और कृष्ण उनमें से किसी को समझाने रुकते नहीं।

अर्जुन इसे जाने नहीं देगा। अगले अध्याय के उसके पहले शब्द ठीक इन्हीं शब्दों की सूची हैं, साथ में यह कि इनका अर्थ क्या है।

वादा ख़ुद सीधा है। जो आपमें अभी स्थिर है, वही अन्त में उपलब्ध रहता है।

आपने इसे कहाँ महसूस किया है

कठिन इम्तिहान के आख़िरी दस मिनट में ज़्यादातर लोग तेज़ और ख़राब लिखते हैं। जिसने विषय सचमुच समझा है वह अक्सर धीमा हो जाता है। दबाव मेज़ के नीचे कोई नया आदमी नहीं गढ़ देता। वह आपको वही दिखा देता है जो पहले से वहाँ बैठा था।

और गहराई में

जाने की घड़ी का पहला ज़िक्र यहाँ आता है, और जिस ढंग से इसे सँभाला गया है उसी से आगे की सारी बातों का सुर तय होता है।

पंक्ति में कोई धमकी नहीं है। कोई चेतावनी नहीं कि आख़िरी पल में चूक जाने वालों का क्या होता है। जो बताया गया है वह निरन्तरता है। जो मन जुड़ा रहा है वह जुड़ा रहता है, और आख़िरी घड़ी अपने अलग नियमों वाली कोई अलग परीक्षा नहीं है।

यह इस शिक्षा के आम इस्तेमाल के ठीक उलट है। अन्त को तैयारी न करने वालों के लिए जाल की तरह नहीं बिछाया जा रहा, और जिसे इससे डराया गया है उसे यह जान लेने का हक़ है।

और इससे अभ्यास को उसका असली औचित्य मिलता है। आख़िरी घड़ी में आप जो भी बन्दोबस्त कर लें, वह उससे ज़्यादा स्थिर नहीं होगा जो आप बरसों से करते आए हैं। बरसों को अन्त की परीक्षा की तैयारी मत समझिए। अन्त बस उन बरसों का पाठ है।