
अध्याय ८ / १८
जो नष्ट नहीं होता
अक्षरब्रह्मयोगः
Akṣara-brahma Yoga · २८ श्लोक
अर्जुन सीधे-सीधे कई प्रश्न पूछता है कि क्या टिकता है, क्या मरता है, और अन्त में क्या होता है। कृष्ण दीर्घ दृष्टि से उत्तर देते हैं: काल के विशाल चक्र, और अन्तिम क्षण में मन जिस ओर मुड़ता है।
यह अध्याय आपको कहाँ छोड़ता है
पैमाना एक जीवन से आगे बढ़ जाता है। मृत्यु तर्क का अन्त न रहकर एक कहीं लम्बी लय का अंश बन जाती है।
श्लोक
संस्कृत पूर्ण · व्याख्या जारी हैअध्याय ८ · श्लोक १
किं तद्ब्रह्म किमध्यात्मं किं कर्म पुरुषोत्तम।अधिभूतं च किं प्रोक्तमधिदैवं किमुच्यते॥
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अध्याय ८ · श्लोक २
अधियज्ञः कथं कोऽत्र देहेऽस्मिन्मधुसूदन।प्रयाणकाले च कथं ज्ञेयोऽसि नियतात्मभिः॥
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अध्याय ८ · श्लोक ३
अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते।भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसंज्ञितः॥
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अध्याय ८ · श्लोक ४
अधिभूतं क्षरो भावः पुरुषश्चाधिदैवतम्।अधियज्ञोऽहमेवात्र देहे देहभृतां वर॥
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अध्याय ८ · श्लोक ५
अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम्।यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः॥
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अध्याय ८ · श्लोक ६
यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्।तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः॥
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अध्याय ८ · श्लोक ७
तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च।मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम्॥
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अध्याय ८ · श्लोक ८
अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना।परमं पुरुषं दिव्यं याति पार्थानुचिन्तयन्॥
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अध्याय ८ · श्लोक ९
कविं पुराणमनुशासितार मणोरणीयांसमनुस्मरेद्यः।सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूप मादित्यवर्णं तमसः परस्तात्॥
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अध्याय ८ · श्लोक १०
प्रयाणकाले मनसाऽचलेन भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव।भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक् स तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम्॥
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अध्याय ८ · श्लोक ११
यदक्षरं वेदविदो वदन्ति विशन्ति यद्यतयो वीतरागाः।यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदं संग्रहेण प्रवक्ष्ये॥
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अध्याय ८ · श्लोक १२
सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च।मूर्ध्न्याधायात्मनः प्राणमास्थितो योगधारणाम्॥
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अध्याय ८ · श्लोक १३
ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन्।यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम्॥
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अध्याय ८ · श्लोक १४
अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः।तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः॥
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अध्याय ८ · श्लोक १५
मामुपेत्य पुनर्जन्म दुःखालयमशाश्वतम्।नाप्नुवन्ति महात्मानः संसिद्धिं परमां गताः॥
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अध्याय ८ · श्लोक १६
आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन।मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते॥
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अध्याय ८ · श्लोक १७
सहस्रयुगपर्यन्तमहर्यद्ब्रह्मणो विदुः।रात्रिं युगसहस्रान्तां तेऽहोरात्रविदो जनाः॥
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अध्याय ८ · श्लोक १८
अव्यक्ताद्व्यक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे।रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसंज्ञके॥
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अध्याय ८ · श्लोक १९
भूतग्रामः स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते।रात्र्यागमेऽवशः पार्थ प्रभवत्यहरागमे॥
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अध्याय ८ · श्लोक २०
परस्तस्मात्तु भावोऽन्योऽव्यक्तोऽव्यक्तात्सनातनः।यः स सर्वेषु भूतेषु नश्यत्सु न विनश्यति॥
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अध्याय ८ · श्लोक २१
अव्यक्तोऽक्षर इत्युक्तस्तमाहुः परमां गतिम्।यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम॥
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अध्याय ८ · श्लोक २२
पुरुषः स परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया।यस्यान्तःस्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम्॥
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अध्याय ८ · श्लोक २३
यत्र काले त्वनावृत्तिमावृत्तिं चैव योगिनः।प्रयाता यान्ति तं कालं वक्ष्यामि भरतर्षभ॥
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अध्याय ८ · श्लोक २४
अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम्।तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः॥
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अध्याय ८ · श्लोक २५
धूमो रात्रिस्तथा कृष्णः षण्मासा दक्षिणायनम्।तत्र चान्द्रमसं ज्योतिर्योगी प्राप्य निवर्तते॥
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अध्याय ८ · श्लोक २६
शुक्लकृष्णे गती ह्येते जगतः शाश्वते मते।एकया यात्यनावृत्तिमन्ययाऽऽवर्तते पुनः॥
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अध्याय ८ · श्लोक २७
नैते सृती पार्थ जानन्योगी मुह्यति कश्चन।तस्मात्सर्वेषु कालेषु योगयुक्तो भवार्जुन॥
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अध्याय ८ · श्लोक २८
वेदेषु यज्ञेषु तपःसु चैव दानेषु यत्पुण्यफलं प्रदिष्टम्।अत्येति तत्सर्वमिदं विदित्वा योगी परं स्थानमुपैति चाद्यम्॥
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