Gita Explained
अर्जुन कहते हैं8.1

किं तद्ब्रह्म किमध्यात्मं किं कर्म पुरुषोत्तम।अधिभूतं च किं प्रोक्तमधिदैवं किमुच्यते॥

kiṃ tad brahma kim adhyātmaṃ kiṃ karma puruṣottamaadhibhūtaṃ ca kiṃ proktam adhidaivaṃ kim ucyate

शब्दार्थ
arjunaḥ uvāca — Arjun saidkim — whattat — thatbrahma — Brahmankim — whatadhyātmam — the individual soulkim — whatkarma — the principle of karmapuruṣa-uttama — Shree Krishna, the Supreme Divine Personalityadhibhūtam — the material manifestationca — andkim — whatproktam — is calledadhidaivam — the Lord of the celestial godskim — whatucyate — is called

श्लोक कहता है

अर्जुन ने कहा: वह ब्रह्म क्या है? आत्मा क्या है? कर्म क्या है? पदार्थ का आधार किसे कहा गया है, और देवताओं का आधार किसे कहते हैं?

सरल शब्दों में

कृष्ण ने पिछला अध्याय तीन पारिभाषिक शब्दों पर ख़त्म किया और उन्हें समझाए बिना आगे बढ़ गए।

अर्जुन उन्हें रोक देता है। पाँच सवाल, कोई माफ़ी नहीं, कोई दिखावा नहीं।

वह एक युद्ध लड़ने वाला है और पहले शब्दों के अर्थ जानना चाहता है।

आपने इसे कहाँ महसूस किया है

दफ़्तर के प्रशिक्षण के बीच सब लोग सिर हिला रहे हैं। एक आदमी हाथ उठाकर कहता है, माफ़ कीजिए, इस शब्द का मतलब क्या है। आधा कमरा चैन की साँस लेता है। सब बीस मिनट से सिर हिला रहे थे, इस इन्तज़ार में कि कोई और पहले पूछे।

और गहराई में

अर्थ पूछना यहाँ एक पूरी तरह सम्मानजनक आध्यात्मिक काम माना गया है, और हर परम्परा में ऐसा नहीं होता।

अर्जुन यह नहीं कहता कि उसने समझ लिया। वह सिर हिलाकर यह उम्मीद नहीं करता कि बाद में साफ़ हो जाएगा। वह उन शब्दों की सूची गिनाता है जो उसे दिए गए और पूछता है कि हर एक का क्या अर्थ है, और उत्तर में कहीं यह संकेत नहीं कि उसे यह पहले से पता होना चाहिए था।

इससे एक सुर तय होता है जो देखने लायक़ है। जो शिक्षा सीधे सवालों को झेल न सके, उसे किसी की चुप्पी बचा नहीं रही होती। वह सिर्फ़ टल रही होती है।

तो अगर आप यह पुस्तक पढ़ते हुए चुपचाप एक तिहाई नहीं समझ पा रहे, तो आप ठीक उसी जगह हैं जहाँ यह पुस्तक अपने शिष्य को बिठाती है। इस श्लोक के सवाल वही हैं जो आप पूछते।