Gita Explained
कृष्ण कहते हैं8.9

कविं पुराणमनुशासितार मणोरणीयांसमनुस्मरेद्यः।सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूप मादित्यवर्णं तमसः परस्तात्॥

kaviṃ purāṇam anuśāsitāramaṇor aṇīyānsam anusmared yaḥsarvasya dhātāram acintya-rūpamāditya-varṇaṃ tamasaḥ parastāt

शब्दार्थ
kavim — poetpurāṇam — ancientanuśāsitāram — the controlleraṇoḥ — than the atomaṇīyānsam — smalleranusmaret — always remembersyaḥ — whosarvasya — of everythingdhātāram — the supportacintya — inconceivablerūpam — divine formāditya-varṇam — effulgent like the suntamasaḥ — to the darkness of ignoranceparastāt — beyond

श्लोक कहता है

जो उस पुरातन कवि को स्मरण करता है, जो सब कुछ नियत करता है, जो सूक्ष्म से भी सूक्ष्म है। जो सबका धारण करने वाला है, जिसका रूप विचार की पकड़ में नहीं आता, जो सूर्य-सा दीप्त है, अन्धकार से परे —

सरल शब्दों में

वर्णनों की एक क़तार जो आपस में बैठती नहीं।

परमाणु से छोटा, और सब कुछ थामे हुए। पुरातन, और अभी सूर्य की तरह चमकता हुआ।

अचिन्त्य-रूपम् — ऐसा रूप जिसके चारों ओर विचार घूम नहीं सकता। यह सूची किसी एक तस्वीर में बदलने के लिए है ही नहीं।

आपने इसे कहाँ महसूस किया है

किसी बड़े शहर में रहने वाले लोगों की संख्या की तस्वीर बनाकर देखिए। आप नहीं बना पाएँगे। एक धुँधली भीड़ बनती है और फिर आप छोड़ देते हैं। फिर भी आप उसी शहर का रास्ता तय कर सकते हैं, उसके बुरे यातायात से बच सकते हैं, और चार बजे किसी एक ख़ास आदमी से मिल सकते हैं। किसी चीज़ की तस्वीर न बना पाना उससे ठीक-ठीक निपटने में रुकावट नहीं है।

और गहराई में

जो वर्णन एक-दूसरे को काट देते हैं, वे वर्णन करने के अलावा कुछ और कर रहे होते हैं।

सूक्ष्म से सूक्ष्म और सबका आधार, दोनों एक साथ चित्र में नहीं आ सकते, और श्लोक ख़ुद यही कहता है — विचार इस रूप तक नहीं पहुँचता। ऐसी सूची कोई तस्वीर नहीं है। वह दिशाओं का समूह है, और हर दिशा एक ग़लत मोड़ बन्द करती है। इतना छोटा कि चीज़ों के बीच एक चीज़ न हो। इतना बड़ा कि किसी चीज़ से बाहर न छूटे।

इसीलिए यह अध्याय बिना माफ़ी माँगे अमूर्त और व्यक्तिगत भाषा के बीच आता-जाता रहता है। कोई भी भाषा अकेले टिकती नहीं।

यह आपको एक ख़ास क़िस्म की नाकामी से बचाता है। अगर आपने कभी यह नतीजा निकाला हो कि आप भक्त नहीं हो सकते क्योंकि आपके मन में भगवान की साफ़ तस्वीर नहीं बनती, तो श्लोक कहता है कि किसी के मन में नहीं बनती, और यह कभी शर्त थी ही नहीं।