Gita Explained
कृष्ण कहते हैं9.1

इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे।ज्ञानं विज्ञानसहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्॥

idaṃ tu te guhyatamaṃ pravakṣyāmyanasūyavejñānaṃ vijñāna-sahitaṃ yaj jñātvā mokṣyase ’śubhāt

शब्दार्थ
śrī-bhagavān uvāca — the Supreme Lord saididam — thistu — butte — to youguhya-tamam — the most confidentialpravakṣyāmi — I shall impartanasūyave — nonenviousjñānam — knowledgevijñāna — realized knowledgesahitam — withyat — whichjñātvā — knowingmokṣyase — you will be releasedaśubhāt — miseries of material existence

श्लोक कहता है

श्रीकृष्ण ने कहा: तुम्हें, जो इसका उपहास नहीं करते, मैं यह परम गुह्य बात बताऊँगा। ज्ञान, उसके अनुभव सहित, जिसे जानकर तुम अशुभ से छूट जाओगे।

सरल शब्दों में

एक ही शर्त है, और वह वैसी नहीं जैसी आप सोचेंगे।

चतुर नहीं। योग्य नहीं। पहले से आस्थावान भी नहीं।

अनसूयवे — जो व्यंग्य नहीं करता। माँगी सिर्फ़ एक चीज़ जा रही है: तिरस्कार का न होना।

आपने इसे कहाँ महसूस किया है

आपके चाचा घर से दूर बिताए उन बरसों के बारे में कभी बात नहीं करते। फिर एक शाम कोई उनसे सीधा सवाल पूछता है, जिसके पीछे कोई मज़ाक़ नहीं जुड़ा होता, और वे एक घंटे तक बोलते हैं। क़िस्से हमेशा से वहीं थे। जो नहीं था वह कोई ऐसा आदमी था जो मुस्कुराकर टाल न रहा हो।

और गहराई में

कसौटी को उपहास न करने पर रख देना उल्लेखनीय रूप से नीची कसौटी है, और देखने लायक़ यह है कि इसमें क्या-क्या छूट जाता है।

किसी विश्वास की ज़रूरत नहीं। कोई दीक्षा नहीं, कोई विद्या नहीं, कोई पूर्व-साधना नहीं, किसी संगठन की सदस्यता नहीं। अयोग्य ठहराने वाला एक ही रवैया है तिरस्कार — यानी नतीजा पहले से तय करके आना और फिर उसकी पुष्टि ढूँढ़ना।

यह नैतिक शर्त से ज़्यादा व्यावहारिक शर्त है। तिरस्कार यहाँ पाप नहीं है; वह बन्द कान है। उस हालत में किसी से कही गई कोई भी बात भीतर पहुँचते-पहुँचते अपने ही ख़िलाफ़ सबूत में बदल जाती है, जिसमें बोलने वाले का दोष नहीं और जिसे बेहतर बोलकर ठीक नहीं किया जा सकता।

तो जिस अध्याय को कृष्ण सबसे गुह्य कहते हैं, उसमें घुसने की शर्त सिर्फ़ यह है कि पाठक ने पहले से फ़ैसला न कर रखा हो। अगर आप यहाँ तक बिना उपहास किए पढ़ आए हैं, तो वही योग्यता है, और दूसरी कोई नहीं।