Gita Explained
सञ्जय कहते हैं1.26

तत्रापश्यत्स्थितान्पार्थः पितॄनथ पितामहान् ।आचार्यान्मातुलान्भ्रातॄन्पुत्रान्पौत्रान्सखींस्तथा॥

tatrāpaśyat sthitān pārthaḥ pitṝīn atha pitāmahānācāryān mātulān bhrātṝīn putrān pautrān sakhīṃs tathāśvaśurān suhṛdaś caiva senayor ubhayor api

शब्दार्थ
tatra: thereapaśyat: sawsthitān: stationedpārthaḥ: Arjunpitṝīn: fathersatha: thereafterpitāmahān: grandfathersācāryān: teachersmātulān: maternal unclesbhrātṝīn: brothersputrān: sonspautrān: grandsonssakhīn: friendstathā: alsośvaśurān: fathers-in-lawsuhṛdaḥ: well-wishersca: andeva: indeedsenayoḥ: armiesubhayoḥ: in both armiesapi: also

श्लोक कहता है

और वहाँ अर्जुन ने दोनों सेनाओं में खड़े देखे: पिता, पितामह, गुरु, मामा, भाई, पुत्र, पौत्र, साथी, श्वसुर और मित्र।

सरल शब्दों में

वह देखता है। और उसे यह दिखता है।

योद्धा नहीं। पद नहीं। रिश्तों की एक सूची, दस रिश्ते, जो सबसे बड़े से सबसे छोटे तक और फिर वापस चलती है - पिता, पितामह, गुरु, मामा, भाई, पुत्र, पौत्र, मित्र।

इसे दुर्योधन की सूची के साथ रखिए। वही मैदान, वही लोग। हर एक नाम एक रिश्ते में बदल गया है।

आपने इसे कहाँ महसूस किया है

बीस साल पुरानी किसी शादी की तस्वीर आपके हाथ लगती है। अब वह आपको तस्वीर की तरह दिखती ही नहीं। दिखता है कि किसने किससे बोलना छोड़ दिया, कौन विदेश चला गया, उन जोड़ों में से कौन आज भी साथ है। वह अब देखने की चीज़ नहीं रही।

और गहराई में

यह श्लोक अध्याय की धुरी है, और कविता उसे व्याकरण से खड़ा करती है।

हर शब्द नाते का शब्द है। एक भी पद या नाम नहीं। और ये नाते पीढ़ियों के आर-पार दोनों दिशाओं में चलते हैं, बड़े और छोटे, इसलिए अर्जुन जिसे देख रहा है वह सेना नहीं, कवच पहनकर सीधा खड़ा एक वंशवृक्ष है, जिसके बीच से एक रेखा खींच दी गई है।

जो वाक्यांश इस पर मुहर लगा देता है वह है उभयोरपि सेनयोः - दोनों सेनाओं में। उसके लोग एक ओर नहीं हैं। वे दोनों ओर हैं। इस युद्ध की कोई ऐसी बनावट नहीं है जिसमें अर्जुन अपनों को न मारे।

इसीलिए गीता का उत्तर साधारण नैतिक सलाह से नहीं दिया जा सकता। यहाँ हर सरल नियम टूट जाता है। अपने परिवार की रक्षा करो - कौन-से आधे की? अपराधी को हराओ - वह आपका भाई है, और आपके गुरु उसकी रक्षा कर रहे हैं। योद्धा का कर्तव्य निभाओ - पोते का कर्तव्य इसके उलटा कहता है।

अर्जुन इसलिए उलझा नहीं है कि वह ठीक से सोच नहीं रहा। वह इसलिए उलझा है कि जिस स्तर पर वह देख रहा है, उस स्तर पर इस स्थिति का सचमुच कोई साफ़ उत्तर नहीं है। कृष्ण का उत्तर कोई छूटा हुआ नियम नहीं देगा। वह स्तर बदल देगा।