Gita Explained
कृष्ण कहते हैं10.19

हन्त ते कथयिष्यामि दिव्या ह्यात्मविभूतयः।प्राधान्यतः कुरुश्रेष्ठ नास्त्यन्तो विस्तरस्य मे॥

hanta te kathayiṣyāmi divyā hyātma-vibhūtayaḥprādhānyataḥ kuru-śreṣṭha nāstyanto vistarasya me

शब्दार्थ
śrī-bhagavān uvāca — the Blessed Lord spokehanta — yeste — to youkathayiṣyāmi — I shall describedivyāḥ — divinehi — certainlyātma-vibhūtayaḥ — my divine gloriesprādhānyataḥ — salientkuru-śreṣṭha — best of the Kurusna — notasti — isantaḥ — limitvistarasya — extensive gloriesme — my

श्लोक कहता है

श्रीकृष्ण ने कहा: ठीक है। मैं तुम्हें अपनी दिव्य विभूतियाँ बताऊँगा — कुरुश्रेष्ठ, केवल मुख्य वाली। मेरे पूरे विस्तार का कोई अन्त नहीं है।

सरल शब्दों में

हन्त — एक उद्गार, कुछ ऐसा जैसे: अच्छा तो फिर।

वे तुरन्त मान जाते हैं और एक ही सीमा रखते हैं। सिर्फ़ मुख्य वाली।

इसलिए नहीं कि बाक़ी गुप्त हैं। इसलिए कि उनका अन्त नहीं है, और सूची को कहीं रुकना पड़ता है।

आपने इसे कहाँ महसूस किया है

आप तीस साल से रसोई चला रही किसी महिला से पूछते हैं कि ज़रूरी चीज़ें कौन-सी हैं। वे आपको वह सब नहीं देतीं जो वे जानती हैं, क्योंकि न वे दे सकती हैं और न आप थाम सकते हैं। वे छह चीज़ें देती हैं, वही छह जो वे चाहेंगी कि किसी के पास हों, अगर उनके पास सिर्फ़ दस मिनट हों।

और गहराई में

चुनाव का खुलकर ऐलान कर देना पूर्णता से ज़्यादा काम का है।

वे साफ़ कहते हैं कि आगे जो है वह अधूरा है। इससे पाठक उस भूल से बच जाता है जो वह वरना करता — सूची को सीमा मान लेना, मानो जिन जगहों का नाम नहीं लिया गया वहाँ वे नहीं हैं। श्लोक ४० दूसरे सिरे पर यही बात फिर कहेगा, और ४१ उसे किसी भी सूची से आगे ले जाएगा।

तो आगे के बीस श्लोक उदाहरण हैं, फ़ेहरिस्त नहीं।

उन्हें ऐसे ही पढ़ना चाहिए। हर चीज़ वहाँ एक तरह की पहचान सिखाने के लिए है, और पहचान आ जाने के बाद सूची अपना काम कर चुकी और रखी जा सकती है। उसे रटना ऐसा होगा जैसे खाना बनाना सीखने के बजाय रसोइए की कही छह बातें रट लेना।