Gita Explained
कृष्ण कहते हैं10.24

पुरोधसां च मुख्यं मां विद्धि पार्थ बृहस्पतिम्।सेनानीनामहं स्कन्दः सरसामस्मि सागरः॥

purodhasāṃ ca mukhyaṃ māṃ viddhi pārtha bṛhaspatimsenānīnām ahaṃ skandaḥ sarasām asmi sāgaraḥ

शब्दार्थ
purodhasām — amongst priestsca — andmukhyam — the chiefsmām — meviddhi — knowpārtha — Arjun, the son of Prithabṛhaspatim — Brihaspatisenānīnām — warrior chiefaham — Iskandaḥ — Kartikeyasarasām — amongst reservoirs of waterasmi — I amsāgaraḥ — the ocean

श्लोक कहता है

पार्थ, पुरोहितों में मुझे उनका प्रमुख बृहस्पति जानो। सेनापतियों में मैं स्कन्द हूँ। जलाशयों में, समुद्र।

सरल शब्दों में

तीन भूमिकाएँ, तीन प्रमुख।

जिस पुरोहित पर घर टिका है। जिस सेनापति पर सेना टिकी है। और फिर समुद्र, जो व्यक्ति है ही नहीं।

ढर्रा टिका हुआ है, और चीज़ें लोगों और वस्तुओं के बीच फिसलती रहती हैं।

आपने इसे कहाँ महसूस किया है

आपके दफ़्तर में कोई है जिसके पदनाम से यह लगभग कुछ पता नहीं चलता कि वे करती क्या हैं। पिछले साल वे एक हफ़्ता नहीं आईं। तीन अलग चीज़ें रुक गईं और कोई ठीक-ठीक नहीं बता पाया क्यों। संगठन के चार्ट में उनका नाम नीचे की ओर एक छोटे खाने में है।

और गहराई में

यहाँ की तीन चीज़ों में से दो लोगों के प्रमुख हैं, और तीसरी वह है जहाँ सारा पानी पहुँचता है, जो अलग क़िस्म का पहला होना है।

समुद्र सबसे अच्छा पानी नहीं है। वह वह है जहाँ पानी जाता है, और जो बनने की राह पर हर नदी है। मुख्य पुरोहित और सेनापति के साथ उसे रख देना चुपचाप यह चौड़ा कर देता है कि अग्रणी होना क्या हो सकता है — सिर्फ़ किसी क्रम का शीर्ष नहीं, बल्कि किसी दिशा का सिरा भी।

अध्याय २ ने यही छवि बहुत अलग काम के लिए बरती थी, यह कहकर कि कामनाएँ स्थिर आदमी में वैसे प्रवेश करती हैं जैसे नदियाँ समुद्र में, जो भरा है और अविचल।

तो यह चीज़ क्रम से ज़्यादा कुछ ढोती है। किसी वर्ग में सबसे बड़ा होने का एक तरीक़ा यह भी है कि आप वह हों जिसकी ओर बाक़ी सब बिना जाने बढ़ रहे हैं, और उनके पहुँचने से अविचल रहें।