Gita Explained
अर्जुन कहते हैं11.25

दंष्ट्राकरालानि च ते मुखानि दृष्ट्वैव कालानलसन्निभानि।दिशो न जाने न लभे च शर्म प्रसीद देवेश जगन्निवास॥

danṣṭrā-karālāni ca te mukhānidṛṣṭvaiva kālānala-sannibhānidiśo na jāne na labhe ca śarmaprasīda deveśa jagan-nivāsa

शब्दार्थ
danṣṭrā — teethkarālāni — terribleca — andte — yourmukhāni — mouthsdṛṣṭvā — having seeneva — indeedkāla-anala — the fire of annihilationsannibhāni — resemblingdiśaḥ — the directionsna — notjāne — knowna — notlabhe — I obtainca — andśarma — peaceprasīda — have mercydeva-īśa — The Lord of lordsjagat-nivāsa — The shelter of the universe

श्लोक कहता है

आपके मुख, अपनी भयानक दाढ़ों के साथ, प्रलय की अग्नि जैसे दिखते हैं। उन्हें देखकर मुझे दिशाएँ नहीं सूझ रहीं और कहीं शरण नहीं मिल रही। देवेश, जगन्निवास, प्रसन्न होइए।

सरल शब्दों में

दिशो न जाने — मुझे पता नहीं कि कौन-सी दिशा कौन-सी है।

सामने की किसी चीज़ से डरा हुआ नहीं। दिशाहीन, जो अलग और बुरी बात है।

और फिर अध्याय की पहली सीधी विनती: प्रसीद — प्रसन्न होइए। कृपया।

आपने इसे कहाँ महसूस किया है

आप किसी अनजान रेलवे स्टेशन से घने कोहरे में बाहर निकलते हैं और हर दिशा एक जैसी लगती है। आप ख़तरे में नहीं हैं और क़स्बा बिलकुल साधारण है। पर आप चलने के लिए कोई दिशा चुन नहीं पा रहे, और खड़े रहना ही इकलौती सुरक्षित चीज़ लगने लगती है।

और गहराई में

दिशाओं का खो जाना इस बात का सटीक वर्णन है कि दर्शन ने क्या किया है, और यह किसी ख़ास चीज़ के डर से बुरा है।

जिस डर की कोई वस्तु हो, वह आपके लिए कुछ करने को छोड़ देता है। आप उसका सामना कर सकते हैं, बच सकते हैं, भाग सकते हैं। अर्जुन जो बताता है वह उस ढाँचे का खो जाना है जिसके भीतर कुछ भी करने का मतलब बनता — न दिशाएँ, न शरण, न ऐसी कोई जगह जो यही न हो। कोई कर्म उपलब्ध नहीं है क्योंकि कर्म करने लायक़ कोई दिशा ही नहीं बची।

यही वह हालत थी जिसमें वह पुस्तक के आरम्भ में था, दूसरे रूप में। अध्याय १ इसी पर ख़त्म हुआ था कि वह रथ में बैठ गया, क्योंकि उसे कोई ऐसी दिशा नहीं दिख रही थी जो विनाशकारी न हो।

फ़र्क़ इसमें है कि वह इसका क्या करता है। तब वह ढह गया और चुप हो गया। यहाँ वह माँगता है। एक शब्द — प्रसन्न होइए — उस आदमी से कहा गया जिससे वह डरा हुआ है, और यही उबरने की पहली चाल है, भले अभी कुछ बदला न हो।