Gita Explained
अर्जुन कहते हैं11.30

लेलिह्यसे ग्रसमानः समन्ता ल्लोकान्समग्रान्वदनैर्ज्वलद्भिः।तेजोभिरापूर्य जगत्समग्रं भासस्तवोग्राः प्रतपन्ति विष्णो॥

lelihyase grasamānaḥ samantāllokān samagrān vadanair jvaladbhiḥtejobhir āpūrya jagat samagraṃbhāsas tavogrāḥ pratapanti viṣṇo

शब्दार्थ
lelihyase — you are lickinggrasamānaḥ — devouringsamantāt — on all sideslokān — worldssamagrān — allvadanaiḥ — with mouthsjvaladbhiḥ — blazingtejobhiḥ — by effulgenceāpūrya — filled withjagat — the universesamagram — allbhāsaḥ — raystava — yourugrāḥ — fiercepratapanti — scorchingviṣṇo — Lord Vishnu

श्लोक कहता है

आप अपने जलते मुखों से सब ओर के सब लोकों को चाट रहे हैं, निगल रहे हैं। विष्णो, आपकी उग्र किरणें पूरे संसार को प्रकाश से भरकर तपा रही हैं।

सरल शब्दों में

आख़िरी पंक्ति दोनों हिस्सों को जोड़ देती है: वही किरणें संसार को भरती हैं और जलाती हैं।

दो काम नहीं। एक।

जो भी यह कर रहा है वह रचने और नष्ट करने के बीच बदल नहीं रहा। वह एक ही काम कर रहा है, और दोनों शब्द उसी का वर्णन करते हैं।

आपने इसे कहाँ महसूस किया है

जो सूरज कपड़े सुखाता है और फ़सल पकाता है, वही अगस्त तक ज़मीन चटका देता है और दोपहर बेकार कर देता है। किसान दो सूरजों से नहीं निपट रहा। इसमें कोई सेटिंग नहीं है।

और गहराई में

एक ही प्रक्रिया का दो शब्दों से वर्णन, यही विचार यह श्लोक व्याख्या आने से पहले पाठक के पास छोड़ जाता है।

संसार को प्रकाश से भरना और उसे तपाना एक ही क्रिया है, एक ही चीज़ की, एक ही क्षण में। कुछ बदलता नहीं। ऐसी कोई मनोदशा नहीं जिसमें यह रुक जाए। अर्जुन जो देख रहा है उसके पीछे कोई मंशा ढूँढ़ता रहा है, और वर्णन यहाँ उसे यह बताने के सबसे क़रीब आता है कि जिस तरह की मंशा वह ढूँढ़ रहा है, वैसी कोई है ही नहीं।

अध्याय ९ ने यही बात ज़्यादा शान्ति से कही थी: मैं वह हूँ जो नहीं मरता, और अन्त भी, और मैं ताप देता हूँ और वर्षा रोकता हूँ।

फ़र्क़ यह है कि वहाँ वह सिद्धान्त था और यहाँ उसे देखा जा रहा है। इसीलिए अगला श्लोक एक और वर्णन नहीं, एक सवाल है — उसके पास इसका वर्णन करने के तरीक़े ख़त्म हो चुके हैं, और उसे जानना है कि यह है क्या।