Gita Explained
अर्जुन कहते हैं11.46

किरीटिनं गदिनं चक्रहस्त मिच्छामि त्वां द्रष्टुमहं तथैव।तेनैव रूपेण चतुर्भुजेन सहस्रबाहो भव विश्वमूर्ते॥

kirīṭinaṃ gadinaṃ cakra-hastamicchāmi tvāṃ draṣṭum ahaṃ tathaivatenaiva rūpeṇa catur-bhujenasahasra-bāho bhava viśva-mūrte

शब्दार्थ
kirīṭinam — wearing the crowngadinam — carrying the macecakra-hastam — disc in handicchāmi — I wishtvām — youdraṣṭum — to seeaham — Itathā eva — similarlytena eva — in thatrūpeṇa — formcatuḥ-bhujena — four-armedsahasra-bāho — thousand-armed onebhava — beviśwa-mūrte — universal form

श्लोक कहता है

मैं आपको वैसा ही देखना चाहता हूँ जैसे आप थे — मुकुट पहने, गदा लिए, हाथ में चक्र लिए। सहस्रबाहु, विश्वमूर्ति, फिर वही चतुर्भुज रूप धारण कीजिए।

सरल शब्दों में

वह कोई ख़ास चीज़ माँगता है, उसके ब्योरों के साथ।

मुकुट, गदा, चक्र। वह जाना-पहचाना रूप, चार भुजाओं वाला।

असीम के बाद वह आकार वाली चीज़ माँग रहा है, और इतने ध्यान से बताता है कि कोई ग़लती न हो।

आपने इसे कहाँ महसूस किया है

दादी के यहाँ हफ़्ते भर रुकी एक बच्ची कहती है कि उसका अपना तकिया भिजवा दीजिए। बेहतर तकिया नहीं। वही। इस माँग का आराम से कोई लेना-देना नहीं है, और जो भी बचपन में घर से दूर रहा है वह इसे ठीक-ठीक समझता है।

और गहराई में

निराकार देख लेने के बाद किसी ख़ास रूप को माँगना पीछे हटना नहीं है, और अगला अध्याय इसे खुलकर कहेगा।

अर्जुन ने वह देख लिया है जिसके कोई किनारे नहीं। वह किनारे वापस माँगता है, और जाने-पहचाने किनारे माँगता है, ब्योरे के साथ। अध्याय में कहीं इसे विफलता या छोटी माँग नहीं माना जाता। वह तुरन्त, बिना किसी टिप्पणी के, मान ली जाती है।

अध्याय १२ इस बात को सीधे रखेगा: ज़्यादातर लोगों के लिए रूप वाला रास्ता आसान है, और वह घटिया रास्ता नहीं है।

यह उस क्रम का चुपचाप सुधार है जो पाठक अक्सर अपने साथ ले आते हैं, जिसमें निराकार को व्यक्तिगत से ऊँचा मान लिया जाता है। इस अध्याय के आदमी को निराकार मिला, पूरी ताक़त में, दिव्य आँख के साथ। उसके बाद वह जो माँगता है वह एक पहचाना हुआ चेहरा है।