Gita Explained
कृष्ण कहते हैं11.5

पश्य मे पार्थ रूपाणि शतशोऽथ सहस्रशः।नानाविधानि दिव्यानि नानावर्णाकृतीनि च॥

paśya me pārtha rūpāṇi śataśo ’tha sahasraśaḥnānā-vidhāni divyāni nānā-varṇākṛtīni ca

शब्दार्थ
śrī-bhagavān uvāca — the Supreme Lord saidpaśya — beholdme — mypārtha — Arjun, the son of Pritharūpāṇi — formsśataśaḥ — by the hundredsatha — andsahasraśaḥ — thousandsnānā-vidhāni — variousdivyāni — divinenānā — variousvarṇa — colorsākṛtīni — shapesca — and

श्लोक कहता है

श्रीकृष्ण ने कहा: तो पार्थ, मेरे रूप देखो — सैकड़ों में, हज़ारों में। कई तरह के, दिव्य, कई रंगों और आकारों के।

सरल शब्दों में

न कोई हिचक, न कोई शर्त।

पश्य — देखो। अगले तीन श्लोकों में यही आज्ञा बार-बार आती है।

वे यह नहीं पूछते कि अर्जुन को पक्का है या नहीं। वे कहते हैं देखो, और सैकड़ों से गिनना शुरू करते हैं।

आपने इसे कहाँ महसूस किया है

आप चालीस साल से काम कर रही एक कुम्हार से पूछते हैं कि क्या आप उनका कुछ काम देख सकते हैं। आप एक ताख़ की उम्मीद कर रहे हैं। वे एक दरवाज़ा खोल देती हैं जिसके पीछे का कमरा आपको पता ही नहीं था, जिसमें दशकों का बिना बिका सब कुछ रखा है, और कहती हैं: देख लीजिए।

और गहराई में

हिचक नहीं, उदारता यहाँ का सुर है, और इससे उस अध्याय का तापमान तय होता है जो आगे चलकर डरावना हो जाता है।

किसी परीक्षा का संकेत नहीं, कोई चेतावनी नहीं, कोई क़ीमत नहीं। माँग तुरन्त मान ली जाती है और जितना माँगा गया उससे ज़्यादा दिया जाता है — सैकड़ों, हज़ारों, कई तरह के। अगले बीस श्लोकों में जो भी हो, वह इसलिए नहीं होता कि कृष्ण कुछ रोक रहे थे या किसी हद से आगे बढ़ने की सज़ा दे रहे थे।

दृश्य के डरावने होने से पहले इसे मन में बिठा लेना चाहिए, क्योंकि बाद का डर पीछे की ओर रंग चढ़ा सकता है।

जिसे कभी यह डर रहा हो कि दिव्य से बहुत ज़्यादा माँगना धृष्टता होगी, उसके लिए अध्याय का उत्तर बाक़ी सब से पहले यही है। माँगना ठीक था। जो कठिनाई आती है वह उलाहना नहीं है।