Gita Explained
सञ्जय कहते हैं11.50

इत्यर्जुनं वासुदेवस्तथोक्त्वा स्वकं रूपं दर्शयामास भूयः।आश्वासयामास च भीतमेनं भूत्वा पुनः सौम्यवपुर्महात्मा॥

ity arjunaṃ vāsudevas tathoktvāsvakaṃ rūpaṃ darśayām āsa bhūyaḥāśvāsayām āsa ca bhītam enaṃbhūtvā punaḥ saumya-vapur mahātmā

शब्दार्थ
sañjayaḥ uvāca — Sanjay saiditi — thusarjunam — to Arjunvāsudevaḥ — Krishna, the son of Vasudevtathā — in that wayuktvā — having spokensvakam — his personalrūpam — formdarśayām āsa — displayedbhūyaḥ — againāśvāsayām āsa — consoledca — andbhītam — frightenedenam — himbhūtvā — becomingpunaḥ — againsaumya-vapuḥ — the gentle (two-armed) formmahā-ātmā — the compassionate

श्लोक कहता है

संजय ने कहा: अर्जुन से ऐसा कहकर कृष्ण ने फिर अपना अपना रूप दिखाया। उस महात्मा ने दोबारा सौम्य शरीर धारण करके उस डरे हुए को ढाढ़स बँधाया।

सरल शब्दों में

सौम्यवपुः — सौम्य शरीर वाला।

शब्द का अर्थ है मृदु, सुखद, चन्द्रमा जैसा। यह पिछले तीस श्लोकों की हर चीज़ का उलटा है।

और आश्वासयामास — उसने उसे ढाढ़स बँधाया। अध्याय का दर्शन किसी के चुप कराए जाने पर ख़त्म होता है।

आपने इसे कहाँ महसूस किया है

घर में बुरी बहस के बाद कोई चुपचाप सबके लिए चाय बना देता है। बहस हुई और कुछ सुलझा नहीं। रसोई लगभग नौ बजे तक फिर बस रसोई हो जाती है।

और गहराई में

दर्शन किसी व्याख्या पर नहीं, किसी के ढाढ़स पाने पर ख़त्म होता है, और यह चुनाव बताता है कि अध्याय किसे ज़रूरी मानता है।

हर विशाल बात पहले ही कही जा चुकी है। काल का नाम लिया जा चुका, योद्धाओं का हिसाब हो चुका, निर्देश दिया जा चुका। कथा अपनी समापन छवि के लिए यह चुनती है कि एक डरा हुआ आदमी अपने मित्र से शान्त किया जा रहा है, जो फिर उस आकार में लौट आया है जिसे वह देख सकता है।

उस आकार के लिए जो शब्द बरता गया है वह वही है जो चाँदनी के लिए बरता जाता।

और इससे चुपचाप तय हो जाता है कि इन दो रूपों में से किसके साथ यह पुस्तक आपसे जीने की उम्मीद करती है। विश्वरूप एक बार, एक आदमी को दिखाया गया और अपनी बात कहते ही वापस ले लिया गया। सौम्य वाला वह है जिसके बग़ल में अर्जुन पूरा युद्ध बिताता है।