Gita Explained
कृष्ण कहते हैं12.19

तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी सन्तुष्टो येन केनचित् ।अनिकेतः स्थिरमतिर्भक्तिमान्मे प्रियो नरः॥

tulya-nindā-stutir maunī santuṣṭo yena kenacitaniketaḥ sthira-matir bhaktimān me priyo naraḥ

शब्दार्थ
tulya — alikenindā-stutiḥ — reproach and praisemaunī — silent contemplationsantuṣṭaḥ — contentedyena kenacit — with anythinganiketaḥ — without attachment to the place of residencesthira — firmly fixedmatiḥ — intellectbhakti-mān — full of devotionme — to mepriyaḥ — very dearnaraḥ — a person

श्लोक कहता है

निन्दा और स्तुति में समान, मौन। जो कुछ मिल जाए उसी में सन्तुष्ट, रहने की जगह से बँधा हुआ नहीं। मन में स्थिर, भक्ति से भरा। वह मनुष्य मुझे प्रिय है।

सरल शब्दों में

अनिकेतः — बिना घर के। बिना किसी तय जगह के।

यह सूची की सबसे अजीब चीज़ है, और इसी को अक्सर घूमते रहने की सिफ़ारिश मान लिया जाता है।

वह जो कुछ मिल जाए उसमें सन्तोष और मन की स्थिरता के बीच बैठी है, जिससे लगता है कि यह न घरों के बारे में है न यात्रा के।

आपने इसे कहाँ महसूस किया है

परिवार बढ़ने पर आपकी दादी पीछे वाले कमरे में चली गईं और उसका ज़िक्र फिर कभी नहीं किया। वे उस घर में चालीस साल रह चुकी थीं और उसके एक-एक इंच के बारे में उनकी राय थी। कमरा बदला तो उन्होंने बस नए कमरे में रहना शुरू कर दिया।

और गहराई में

इस सूची की यही चीज़ सबसे ज़्यादा ग़लत जगह लगाई जा सकती है, और सन्दर्भ ही उसका अर्थ तय करता है।

शब्दशः पढ़ें तो यह बेघर होने की सिफ़ारिश है, और कुछ परम्पराओं ने औपचारिक संन्यासियों के लिए इसे वैसे ही लिया है। पर श्लोक अर्जुन से कहा जा रहा है, जिसके पास परिवार है, उत्तराधिकार में राज्य है और लड़ने को युद्ध है, और अध्याय में कहीं यह संकेत नहीं कि उससे सब छोड़ने को कहा जा रहा है।

जो कुछ मिल जाए उसमें सन्तोष और मन की स्थिरता के बीच इसका अर्थ इसके ज़्यादा नज़दीक है कि आप किसी ख़ास बन्दोबस्त के सहारे खड़े नहीं हैं।

और इसे घर बदले बिना जाँचा जा सकता है। ज़्यादातर लोगों की शान्ति चुपचाप किसी चीज़ पर टिकी होती है — एक कमरा, एक दिनचर्या, एक ख़ास समय पर एक ख़ास कुर्सी। इसमें कुछ भी ग़लत नहीं है। श्लोक बस यह पूछता है कि जिस दिन वह बदलेगा उस दिन आपका क्या होगा।