Gita Explained
कृष्ण कहते हैं12.7

तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात्।भवामि नचिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम्॥

teṣām ahaṃ samuddhartā mṛtyu-saṃsāra-sāgarātbhavāmi na cirāt pārtha mayy āveśita-cetasām

शब्दार्थ
teṣām — of thoseaham — Isamuddhartā — the deliverermṛtyu-saṃsāra-sāgarāt — from the ocean of birth and deathbhavāmi — (I) becomena — notcirāt — after a long timepārtha — Arjun, the son of Prithamayi — with meāveśita cetasām — of those whose consciousness is united

श्लोक कहता है

— पार्थ, उनके लिए मैं मरने और जन्मने के समुद्र से बाहर निकालने वाला बन जाता हूँ। और देर नहीं लगती, क्योंकि उनका मन मुझमें प्रवेश कर चुका है।

सरल शब्दों में

समुद्धर्ता — बाहर निकाल लेने वाला।

छवि यह है कि कोई पानी में है और कोई दूसरा उसे खींचकर निकाल रहा है। तैरना सिखाया नहीं जा रहा। उठा लिया जा रहा है।

और न चिरात् — देर नहीं लगती। इस पुस्तक में यही एक जगह है जहाँ समय-सीमा छोटी है।

आपने इसे कहाँ महसूस किया है

आप किसी ऐसी दावत में हैं जहाँ आप किसी को नहीं जानते, दीवार के पास गिलास लिए खड़े हैं। कोई, जिसे आप आधा-अधूरा जानते हैं, कमरा पार करके आपसे बात करने लगता है। वह आपको लोगों में घुलना नहीं सिखाता। वह बस आपके पास खड़ा रहता है जब तक शाम झेलने लायक़ न हो जाए।

और गहराई में

तैरना सीखने के बजाय बाहर उठा लिया जाना इस चीज़ के चलने का अलग ब्योरा है, और श्लोक उसे जानबूझकर चुनता है।

अब तक सब कुछ अभ्यास का वर्णन था: स्थिरता, अनुशासन, फल को छोड़ना। यहाँ जिससे कहा जा रहा है वह एक काम करता है और बाक़ी कोई और करता है। शब्द सक्रिय और शारीरिक है — एक हाथ नीचे तक पहुँचता हुआ।

समय-सीमा भी मायने रखती है। अध्याय ७ ने कहा था कि महात्मा बहुत जन्मों के बाद आता है। यहाँ न चिरात् है, देर नहीं, और यह विरोध नहीं, रास्ता बदलने का फ़र्क़ है।

जिसने अपनी प्रगति का हिसाब लगाकर निराशा पाई हो, उसके लिए इसमें राहत है। आप किस रफ़्तार से सुधर रहे हैं, इस ब्योरे के हिसाब से, वह चीज़ नहीं है जो नतीजा तय करती है।