Gita Explained
कृष्ण कहते हैं12.9

अथ चित्तं समाधातुं न शक्नोषि मयि स्थिरम्।अभ्यासयोगेन ततो मामिच्छाप्तुं धनञ्जय॥

atha cittaṃ samādhātuṃ na śaknoṣi mayi sthiramabhyāsa-yogena tato mām icchāptuṃ dhanañjaya

शब्दार्थ
atha — ifcittam — mindsamādhātum — to fixna śaknoṣi — (you) are unablemayi — on mesthiram — steadilyabhyāsa-yogena — by uniting with God through repeated practicetataḥ — thenmām — meicchā — desireāptum — to attaindhanañjaya — Arjun, the conqueror of wealth

श्लोक कहता है

यदि तुम अपना मन मुझ पर स्थिर नहीं कर पाते, तो अभ्यास-योग से मुझ तक पहुँचने की इच्छा करो, अर्जुन।

सरल शब्दों में

अथ — यदि। तीन में से पहला।

वे अभी निर्देश दे चुके हैं और अब मान लेते हैं कि वह काम नहीं आया।

और विकल्प है अभ्यास-योग — दोहराव। कोई ज़्यादा चतुर तरीक़ा नहीं। वही चीज़, फिर से।

आपने इसे कहाँ महसूस किया है

आप बिना रुके एक चक्कर तैर नहीं सकते। कोई यह नहीं कहता कि और ध्यान लगाइए। आप जितना तैर सकते हैं उतना तैरते हैं, हफ़्ते में चार बार, और दो महीने में वह चक्कर बिना कोशिश किए हो जाता है।

और गहराई में

और हौसले के बजाय एक नीची सीढ़ी दिया जाना ही इस हिस्से को भरोसेमन्द बनाता है।

आदर्श श्लोक ८ में कहा जा चुका। यहाँ, तुरन्त, छूट है — और वह लक्ष्य का पतला किया हुआ रूप नहीं, उस तक जाने का दूसरा रास्ता है। दोहराव आपसे यह नहीं माँगता कि आप उसी चीज़ को सँभालें जिसमें आप अभी चूके। वह माँगता है कि आप पहुँचें।

अध्याय ६ ने यही पेशकश इन्हीं शब्दों में की थी, जब अर्जुन ने कहा था कि मन हवा जितना कठिन है और उसे बताया गया कि अभ्यास फिर भी कर देगा।

नीचे छिपा दावा यह है कि क्षमता बुलाई नहीं जाती, बनाई जाती है। कोई तय करके अपना ध्यान कहीं नहीं टिकाता। वे कोई चीज़ इतनी बार करते हैं कि ध्यान अपने आप चला जाता है, और श्लोक इसे कमतर नहीं, सामान्य मामला मानता है।