Gita Explained
कृष्ण कहते हैं13.17

अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम्।भूतभर्तृ च तज्ज्ञेयं ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च॥

avibhaktaṃ ca bhūteṣu vibhaktam iva ca sthitambhūta-bhartṛ ca taj jñeyaṃ grasiṣṇu prabhaviṣṇu ca

शब्दार्थ
avibhaktam — indivisibleca — althoughbhūteṣu — amongst living beingsvibhaktam — dividediva — apparentlyca — yetsthitam — situatedbhūta-bhartṛ — the sustainer of all beingsca — alsotat — thatjñeyam — to be knowngrasiṣṇu — the annihilatorprabhaviṣṇu — the creatorca — and

श्लोक कहता है

वह अविभक्त है, और फिर भी प्राणियों में ऐसे खड़ा है मानो बँटा हुआ हो। उसे ही जानना है — वह जो प्राणियों को थामता है, उन्हें समेट लेता है, और उन्हें प्रकट करता है।

सरल शब्दों में

विभक्तमिव — मानो बँटा हुआ। छोटा शब्द है इव, मानो।

बँटवारा इस अर्थ में असली है कि आप उसे भोगते हैं। वह इस अर्थ में असली नहीं कि नीचे तक जाता हो।

और फिर तीन काम: थामना, समेटना, प्रकट करना। तीनों, एक ही कर्ता।

आपने इसे कहाँ महसूस किया है

एक घर में छह लोगों के पास एक ही बचपन के छह अलग संस्करण हैं। हर एक ईमानदारी से बताया गया है और कोई दो आपस में नहीं मिलते। घर एक था, बरस एक थे, माँ एक थीं। बँटवारा जीने में हुआ, बरसों में नहीं।

और गहराई में

प्रतीत होने वाला बँटवारा एक सटीक दावा है और उसे दोनों दिशाओं में सपाट कर देना आसान है।

यह कहना कि बँटवारा सिर्फ़ प्रतीत होता है, इसका मतलब यह नहीं कि आपका अलग होना एक ग़लती है जिसे आप करना बन्द कर दें। आपका अपना शरीर है, अपना दर्द है, और आपका खाना कोई और नहीं खा सकता। श्लोक यह सब इव शब्द से मान लेता है — वह प्राणियों में मानो बँटा हुआ खड़ा है, और वह मानो ही उसके भीतर बैठे हर आदमी के लिए असल हालत है।

जिससे इनकार किया जा रहा है वह यह कि बँटवारा नीचे तक जाता है।

इसका व्यावहारिक भार इस पर पड़ता है कि आप लोगों के साथ कैसे बरतते हैं। अगर अलगाव असली है पर आख़िरी नहीं, तो न उदासीनता सही है न घुल जाना। आपसे यह नहीं कहा जा रहा कि दूसरे का दर्द अपना जैसा महसूस कीजिए, और आपको यह हक़ भी नहीं कि उसे कहीं और घटती चीज़ मान लीजिए।