Gita Explained
कृष्ण कहते हैं13.3

क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत।क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं यत्तज्ज्ञानं मतं मम॥

kṣetra-jñaṃ cāpi māṃ viddhi sarva-kṣetreṣu bhāratakṣetra-kṣetrajñayor jñānaṃ yat taj jñānaṃ mataṃ mama

शब्दार्थ
kṣetra-jñam — the knower of the fieldca — alsoapi — onlymām — meviddhi — knowsarva — allkṣetreṣu — in individual fields of activitiesbhārata — scion of Bharatkṣetra — the field of activitieskṣetra-jñayoḥ — of the knower of the fieldjñānam — understanding ofyat — whichtat — thatjñānam — knowledgematam — opinionmama — my

श्लोक कहता है

भारत, सब क्षेत्रों में क्षेत्रज्ञ भी मुझे ही जानो। क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ को समझ लेना — मेरे मत में, वही ज्ञान है।

सरल शब्दों में

दावा चौड़ा होता है, और जल्दी।

सिर्फ़ यह नहीं कि हर आदमी के पास एक जानने वाला है। बल्कि यह कि हर क्षेत्र में जानने वाला वही हैं।

और फिर ज्ञान की ऐसी परिभाषा जो ज़्यादातर लोगों को चौंकाएगी: तथ्य नहीं, बल्कि यह एक भेद पकड़ लेना।

आपने इसे कहाँ महसूस किया है

गली के हर घर का अपना मीटर है, अपना बिल, बत्तियाँ जलती छोड़ने की अपनी आदतें। सबमें आने वाली बिजली एक ही जगह से आती है। किसी को यह साझा करने जैसा महसूस नहीं होता — रसोई की बत्ती बस जल रही है — और बात फिर भी सच है।

और गहराई में

हर क्षेत्र में एक ही जानने वाला, यह दावा तुरन्त नतीजे पैदा करता है, और परम्पराएँ इसे लेकर तीख़ी तरह बँटी हुई हैं।

अद्वैत वाला पाठ इसे पूरी ताक़त से लेता है: एक ही जानने वाला है, जो अनेक दिखता है, और अनेकता क्षेत्रों में है, उन्हें जानने वाले में नहीं। दूसरे सम्प्रदाय इसे यह मानते हैं कि परमात्मा हर जीव के भीतर उपस्थित है बिना दोनों के एक हुए — निकटता, एकता नहीं।

श्लोक इसे तय नहीं करता, और जो आपसे कहे कि यह साफ़ तय करता है, उसने कोई सम्प्रदाय चुन लिया है और बताया नहीं।

दोनों पाठों में जो साझा है वही पाठक के लिए मायने रखता है। जो कुछ आपके भीतर से बाहर देख रहा है वह आपकी निजी सम्पत्ति नहीं है, जिसे आपके अपने इतिहास ने बनाया हो। इस परम्परा के किसी भी पाठ में वह चेतना आपकी वैसे नहीं है जैसे आपकी राय आपकी है, और यहीं से अगले तीस श्लोकों का हर नैतिक दावा शुरू होता है।