Gita Explained
कृष्ण कहते हैं13.6

महाभूतान्यहङ्कारो बुद्धिरव्यक्तमेव च।इन्द्रियाणि दशैकं च पञ्च चेन्द्रियगोचराः॥

mahā-bhūtāny ahankāro buddhir avyaktam eva caindriyāṇi daśaikaṃ ca pañca cendriya-gocarāḥ

शब्दार्थ
mahā-bhūtāni — the (five) great elementsahankāraḥ — the egobuddhiḥ — the intellectavyaktam — the unmanifested primordial mattereva — indeedca — andindriyāṇi — the sensesdaśa-ekam — elevenca — andpañca — fiveca — andindriya-go-carāḥ — the (five) objects of the senses

श्लोक कहता है

पाँच महाभूत, अहंकार, बुद्धि, और अव्यक्त। ग्यारह इन्द्रियाँ, और वे पाँच विषय जिनमें इन्द्रियाँ चलती हैं —

सरल शब्दों में

क्षेत्र की सूची शुरू होती है, और वह हिस्सों की सूची है।

पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश। फिर कोई ख़ास व्यक्ति होने का भाव, फिर तर्क करने वाली बुद्धि, फिर वह अव्यक्त जिससे ये निकलते हैं।

फिर ग्यारह इन्द्रियाँ — पाँच जो लेती हैं, पाँच जो करती हैं, और मन — और पाँच चीज़ें जिनके लिए इन्द्रियाँ हैं।

आपने इसे कहाँ महसूस किया है

आप किसी पुराने रेडियो की पीठ खोलते हैं और भीतर पुर्ज़ों की एक सूची है, हर एक का अपना काम। इनमें से कोई भी संगीत नहीं है। संगीत होने के लिए हर एक ज़रूरी है, और आप हर एक की ओर उँगली रख सकते हैं, और यह उँगली उस चीज़ तक कभी नहीं पहुँचती जिसके लिए आपने रेडियो चलाया था।

और गहराई में

अपनी ही सूची पढ़ना अजीब अनुभव है, और वही अजीबपन इसे इतनी जल्दी रखने का कारण है।

यहाँ गिनाई हर चीज़ क्षेत्र वाली तरफ़ है। महाभूत, ज़ाहिर है। इन्द्रियाँ, ज़ाहिर है। और फिर वे दो जो ज़ाहिर नहीं हैं: अहंकार, कोई ख़ास व्यक्ति होने का भाव, और बुद्धि, जो तर्क करती और तय करती है। दोनों क्षेत्र के हिस्से गिनाए गए हैं — जानी जाने वाली चीज़ें, जानने वाला नहीं।

अध्याय ७ ने यही क़दम एक पंक्ति में उठाया था। यहाँ वह सूची बनाकर उठाया जा रहा है।

असर तर्क से नहीं, जमा होने से होता है। सूची के अन्त तक पाठक लगभग उस सब को, जिसे वह अपने को कहता, काग़ज़ पर उपकरण की तरह लिखा हुआ देख चुका होता है, और जो बचा उसके बारे में अब तक कुछ कहा ही नहीं गया।