Gita Explained
कृष्ण कहते हैं13.8

अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम्।आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः॥

amānitvam adambhitvam ahinsā kṣāntir ārjavamācāryopāsanaṃ śaucaṃ sthairyam ātma-vinigrahaḥ

शब्दार्थ
amānitvam — humblenessadambhitvam — freedom from hypocrisyahinsā — non-violencekṣāntiḥ — forgivenessārjavam — simplicityācārya-upāsanam — service of the Guruśaucam — cleanliness of body and mindsthairyam — steadfastnessātma-vinigrahaḥ — self-control

श्लोक कहता है

अपने को बड़ा न समझना। दिखावा न करना। किसी को हानि न पहुँचाना। क्षमा, सरलता, गुरु की सेवा। स्वच्छता, स्थिरता, और अपने को वश में रखना —

सरल शब्दों में

यहाँ अध्याय मुड़ता है, और मोड़ अचानक है।

बीस गुणों की सूची शुरू होती है, और उसके अन्त में कृष्ण कहेंगे: यही ज्ञान है।

अभी-अभी दी गई फ़ेहरिस्त नहीं। ये। इस अध्याय में ज्ञान एक बरताव निकलता है।

आपने इसे कहाँ महसूस किया है

आपके चाचा ने ग्यारह साल तक अपने भाई के परिवार को पैसे भेजे और कभी किसी को नहीं बताया। घर बदलने के बाद बैंक की एक चिट्ठी से आपको पता चला। वे विनम्रता नहीं दिखा रहे थे। उन्हें यह ख़याल ही नहीं आया था कि यह बताने वाली चीज़ है।

और गहराई में

ज्ञान को बरतावों की सूची बताना इस अध्याय का सबसे चौंकाने वाला काम है, और उसे पढ़कर आगे निकल जाना आसान है।

श्लोक ७ तक सब विश्लेषण था — अंग, श्रेणियाँ, क्या कहाँ बैठता है। पाठक उम्मीद करेगा कि ज्ञान का मतलब उस विश्लेषण को ठीक से पकड़ लेना होगा। इसके बजाय वह शब्द विनम्रता, धैर्य, सरलता और दिखावे की अनुपस्थिति से जोड़ दिया जाता है।

पहली ही चीज़ सुर तय कर देती है। अमानित्वम् का अर्थ है एक ख़ास तरह से अपने को बड़ा न मानना: देखे जाने की ज़रूरत न होना।

इसका अर्थ यह है कि वह विश्लेषण उस आदमी के पास ठीक से टिक ही नहीं सकता जिसे प्रभावशाली दिखना ज़रूरी हो। आप श्रेणियाँ सीख सकते हैं और सीखते हुए दिखने की ज़रूरत भी रख सकते हैं, और यह अध्याय कहता है कि उस आदमी ने समझा नहीं, चाहे वह कितनी भी सटीकता से दोहरा ले।