Gita Explained
कृष्ण कहते हैं14.1

परं भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम्।यज्ज्ञात्वा मुनयः सर्वे परां सिद्धिमितो गताः॥

paraṃ bhūyaḥ pravakṣyāmi jñānānāṃ jñānam uttamamyaj jñātvā munayaḥ sarve parāṃ siddhim ito gatāḥ

शब्दार्थ
śrī-bhagavān uvāca — the Divine Lord saidparam — supremebhūyaḥ — againpravakṣyāmi — I shall explainjñānānām — of all knowledgejñānam uttamam — the supreme wisdomyat — whichjñātvā — knowingmunayaḥ — saintssarve — allparām — highestsiddhim — perfectionitaḥ — through thisgatāḥ — attained

श्लोक कहता है

श्रीकृष्ण ने कहा: मैं तुम्हें फिर से वह परम ज्ञान बताऊँगा, सब जानने में सर्वोत्तम। जिसे जानकर सब मुनि यहाँ से परम सिद्धि को गए।

सरल शब्दों में

भूयः — फिर से। वे यह पहले कह चुके हैं और दोबारा कह रहे हैं।

तीनों गुण अध्याय ३, ७ और १३ में आ चुके हैं, बिना ढंग से रखे गए।

यह अध्याय वह जगह है जहाँ इस विषय को आख़िरकार अपना हिस्सा मिलता है।

आपने इसे कहाँ महसूस किया है

एक शिक्षिका ने पूरे सत्र में वही बात चार बार चलते-चलते कही है। फिर एक हफ़्ते वे रुकती हैं, चॉक नीचे रखती हैं और कहती हैं: अच्छा, अब इसे ढंग से। कक्षा सीधी हो जाती है, क्योंकि उन्होंने ये शब्द पहले सुने हैं और जानते हैं कि कभी ठीक से पकड़ नहीं पाए।

और गहराई में

जिस चीज़ का ज़िक्र कई बार हो चुका हो उस पर लौटना इस बात का संकेत है कि पिछले ज़िक्र काफ़ी नहीं थे, और अध्याय यह अपने पहले ही शब्द में कह देता है।

तीनों गुण इस पुस्तक में अध्याय ३ से काम कर रहे हैं, जहाँ उन्हें वह बताया गया था जो असल में कर्म करता है। अध्याय ७ ने कहा कि तीनों उन्हीं से आते हैं और वे उनमें नहीं हैं। अध्याय १३ ने उन्हें प्रकृति से जन्मा गिनाया। इनमें से किसी हिस्से ने यह नहीं बताया कि वे हैं क्या।

यह अध्याय बताता है, और यही वह सन्दर्भ है जिस पर बाक़ी पुस्तक, ख़ासकर अध्याय १८, टिकी है।

पाठक के लिए इससे यह ऐसा अध्याय बन जाता है जिसमें धीमे चलना बनता है। यहाँ जो शब्दावली बनती है — प्रकृति की हर चीज़ को तौलने के तीन ढंग — वह यहाँ से अन्त तक बरती जाती है, और आख़िरी अध्याय तो इसके बिना लगभग पढ़ा ही नहीं जा सकता।