Gita Explained
कृष्ण कहते हैं15.10

उत्क्रामन्तं स्थितं वापि भुञ्जानं वा गुणान्वितम्।विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषः॥

utkrāmantaṃ sthitaṃ vāpi bhuñjānaṃ vā guṇānvitamvimūḍhā nānupaśyanti paśyanti jñāna-cakṣuṣaḥ

शब्दार्थ
utkrāmantam - departingsthitam - residingvā api - or evenbhuñjānam - enjoysvā - orguṇa-anvitam - under the spell of the modes of material naturevimūḍhāḥ - the ignorantna - notanupaśyanti - percievepaśyanti - beholdjñāna-cakṣuṣaḥ - those who possess the eyes of knowledge

श्लोक कहता है

मूढ़ लोग उसे न जाते हुए देखते हैं, न ठहरे हुए, न गुणों के बीच भोगते हुए। जिनके पास ज्ञान की आँख है, वे देख लेते हैं।

सरल शब्दों में

तीन क्षण गिनाए गए हैं - जाना, ठहरना, भोगना। मोटे तौर पर यही पूरा जीवन है।

ज़्यादातर लोग इन तीनों में से किसी में भी करने वाले को नहीं देखते। इसलिए नहीं कि वह छिपा है। इसलिए कि वे कहीं और देख रहे हैं।

कृष्ण इस फ़र्क़ को आँख कहते हैं। विश्वास नहीं, निष्कर्ष नहीं। कुछ ऐसा जिससे या तो आप देखते हैं या नहीं देखते।

आपने इसे कहाँ महसूस किया है

आपकी पत्नी दो दिन से चुप है और आपने तय कर लिया है कि वे आपसे नाराज़ हैं। तीसरी शाम वे बताती हैं कि उनकी सबसे पुरानी सहेली विदेश जा रही है। उन दो दिनों के बारे में कुछ भी नहीं बदलता। आपने जो भी देखा वह सब सही था। आप बस उसे हाथ में ग़लत सवाल लेकर पढ़ रहे थे।

और गहराई में

आँख कोई तर्क नहीं है, और ज्ञान को आँख कहना इस श्लोक का सबसे काम का क़दम है।

ज्ञान-चक्षु यानी जानने की आँख। किसी को बहस से दिखाया नहीं जा सकता। आज तक किसी को समझा-बुझाकर कोई रंग नहीं दिखाया गया। या तो आप सही चीज़ देख रहे हैं, या आप किसी और चीज़ को देख रहे हैं और आपके सारे तथ्य सही हैं।

इससे एक आरामदेह बहाना भी हट जाता है। यह नहीं कहा गया कि आत्मा छिपी है। कहा गया है कि मूढ़ उसे नहीं देखते, यानी वह पूरे समय सामने ही थी। ध्यान न जाना और न दिखाया जाना एक बात नहीं है।

और जो तीन क्षण गिनाए गए वे बिलकुल साधारण हैं। ठहरना, जाना, भोगना। ऐसा कोई ख़ास अवसर नहीं जिस पर यह दिखने लगे। यह किसी दोपहर के बीच उपलब्ध है, या फिर कभी नहीं।