श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च।अधिष्ठाय मनश्चायं विषयानुपसेवते॥
śrotraṃ cakṣuḥ sparśanaṃ ca rasanaṃ ghrāṇam eva caadhiṣṭhāya manaś cāyaṃ viṣayān upasevate
शब्दार्थ
श्लोक कहता है
कान, आँख, त्वचा, जीभ और नाक पर टिककर, और मन पर भी, वह संसार की चीज़ों को भोगता है।
सरल शब्दों में
सूची जानबूझकर सादी है। कान, आँख, त्वचा, जीभ, नाक। फिर मन, जिसे छठा गिना गया है।
आत्मा संसार को सीधे नहीं छूती। वह छह दरवाज़ों के पीछे बैठकर सामान लेती है।
पहली बार यह विचार अजीब लगता है। किसी भी चीज़ के बारे में आपने आज तक जो कुछ जाना, वह इन्हीं छह दरवाज़ों में से किसी एक से आया।
आपने इसे कहाँ महसूस किया है
आपके दफ़्तर के पास की कैंटीन में खाना बनाने वाली महिला किसी और की बनाई दाल का एक चम्मच चखकर सही-सही बता देती है कि उसमें थोड़ा गुड़ पड़ा है। आप वही चम्मच चखते हैं और आपको दाल मिलती है। उनकी जीभ आपसे अच्छी नहीं है। उन्होंने बीस साल उसी एक दरवाज़े से ध्यान दिया है, और वही कौर उन तक आपसे ज़्यादा ख़बर लेकर पहुँचता है।
और गहराई में
मन को छठी इन्द्रिय गिनना असली दावा है, कोई सुन्दर गिनती नहीं।
हम आमतौर पर पाँच इन्द्रियों को तथ्य जुटाते और मन को ऊपर बैठकर फ़ैसला करते देखते हैं। गीता मन को उसी पंक्ति में बिठा देती है। मनस् एक उपकरण है, कान की तरह। वह विचार वैसे ही लाता है जैसे कान आवाज़ लाता है, और आपने उस विचार को उतना ही चुना जितना बाहर का शोर।
यह अजीब तरह से मुक्त करने वाला है। अगर विचार आई हुई चीज़ है, बनाई हुई नहीं, तो आप उसे देख सकते हैं, उसमें बदलने के बजाय। गली में हुई आवाज़ का मतलब यह नहीं कि आपसे कोई चूक हुई।
तो अगली बार जो अनचाहा विचार आए, उससे बहस करने की ज़रूरत नहीं। उसे सुन लेना काफ़ी है, जैसे आप स्कूटर को गुज़रते सुनते हैं, और उसके बाद उसे आपसे और कुछ नहीं चाहिए।