यातयामं गतरसं पूति पर्युषितं च यत्।उच्छिष्टमपि चामेध्यं भोजनं तामसप्रियम्॥
yāta-yāmaṃ gata-rasaṃ pūti paryuṣitaṃ ca yatucchiṣṭam api cāmedhyaṃ bhojanaṃ tāmasa-priyam
शब्दार्थ
श्लोक कहता है
जो भोजन बहुत देर रखा रहा, जिसका स्वाद चला गया, जो बिगड़ गया, रात भर पड़ा रहा, जूठा या अशुद्ध है। जड़ता वालों को वही भाता है।
सरल शब्दों में
इसे किसी और चीज़ से पहले एक रेलिंग चाहिए, क्योंकि इसे ग़रीब लोगों का श्लोक बना देना आसान है।
वह है नहीं। जो कल का खाना इसलिए खा रहा है कि और कुछ है ही नहीं, वह इस श्लोक में है ही नहीं। विषय है पसन्द - जब चुनाव हो तब आदमी किस ओर हाथ बढ़ाता है।
तमस भारीपन का धागा है। वह उसे चुनता है जो सबसे कम माँगे: सबसे कम मेहनत, सबसे कम ध्यान, सबसे कम परवाह।
आपने इसे कहाँ महसूस किया है
परसों की एक थाली आपके फ़्रिज में पड़ी है, और आप दूसरी चीज़ों तक पहुँचने के लिए उसे बार-बार खिसकाते हैं। आप उसे खाने वाले नहीं हैं और फेंकने वाले भी नहीं हैं। दोनों में से कोई भी तय करने में क़रीब चालीस सेकंड लगते। वह दो दिन से वहाँ है और शायद कल भी वहीं रहेगी।
और गहराई में
यह पसन्द के बारे में है, और पसन्द तथा मजबूरी का फ़र्क़ पकड़े रखना होगा वरना पूरी बात निर्दयी हो जाती है।
जो पुराना खाना इसलिए खा रहा है कि इतना ही है, उसका तमस से कोई लेना-देना नहीं। भूख प्रकृति का धागा नहीं है। यहाँ उस आदमी का वर्णन है जिसके पास विकल्प हैं और जो उसे चुनता है जो उससे सबसे कम माँगता है।
भारीपन का धागा बुरी चीज़ें नहीं चाहता। वह सस्ती चीज़ें चाहता है - मेहनत में सस्ती, ध्यान में सस्ती। बासीपन सबसे साफ़ उदाहरण भर है, क्योंकि भोजन वही एक जगह है जहाँ परवाह न करने का निशान दिख जाता है।
और ज़्यादातर जीवनों में इसका ईमानदार रूप सड़ा खाना नहीं है। वह वह शाम है जो बिना चुने बीत जाती है, वह बातचीत जो आप आधी करते हैं, वह कमरा जो आपको दिखना बन्द हो चुका है। कुछ ग़लत नहीं होता। वह बस बीत जाता है, और उसे किसी ने चुना नहीं।