Gita Explained
कृष्ण कहते हैं18.27

रागी कर्मफलप्रेप्सुर्लुब्धो हिंसात्मकोऽशुचिः।हर्षशोकान्वितः कर्ता राजसः परिकीर्तितः॥

rāgī karma-phala-prepsur lubdho hinsātmako ‘śuciḥharṣa-śokānvitaḥ kartā rājasaḥ parikīrtitaḥ

शब्दार्थ
rāgī: cravingkarma-phala: fruit of workprepsuḥ: covetlubdhaḥ: greedyhinsā-ātmakaḥ: violent-naturedaśuciḥ: impureharṣa-śoka-anvitaḥ: moved by joy and sorrowkartā: performerrājasaḥ: in the mode of passionparikīrtitaḥ: is declared

श्लोक कहता है

भूखा, फल की ओर हाथ बढ़ाता हुआ, लालची। नुक़सान करने को तैयार, मैला। और हर्ष तथा शोक में झूलता हुआ। वह कर्ता राजस कहलाता है।

सरल शब्दों में

दूसरी क़िस्म, और आख़िरी चीज़ ही उसे परिभाषित करती है।

हर्ष-शोक-अन्वित - हर्ष और शोक में बहा हुआ। अच्छे दिनों में ऊपर, बुरे में नीचे, और झूला उसके बस में नहीं है।

लालच और नुक़सान गम्भीर हैं। पर बाक़ी सब चलता उसी झूले से है।

आपने इसे कहाँ महसूस किया है

विक्रम शेयर का काम करते हैं और दिन में क़रीब चालीस बार भाव देखते हैं। अच्छी सुबह हो तो वे उदार और मज़ाक़िया होते हैं और दफ़्तर भर को खाना खिला देते हैं। बुरी हो तो कोई उनके पास नहीं जाता। उनकी पत्नी दरवाज़े की आवाज़ से बता देती हैं कि दिन किस तरह का रहा, इससे पहले कि वे कुछ कहें।

और गहराई में

नतीजों से झूलना ही वह चीज़ है जिससे वेगवाला कर्ता असल में पीड़ित है, और उसे साथ गिनाई गई नैतिक कमियों से अलग करना ठीक रहेगा।

लालच और नुक़सान करने की तैयारी वे चीज़ें हैं जो हमें दिखती हैं, क्योंकि उनका असर दूसरों पर पड़ता है। पर वे नीचे की ओर बहती हुई चीज़ें हैं। जब आपकी दशा नतीजे से तय होती हो, तो आप नतीजे को क़ाबू में रखने के लिए बहुत कुछ करेंगे, और लपकना तथा नुक़सान वहीं से आते हैं।

झूले के लिए जो शब्द आया है वह सख़्त है। ऐसा आदमी नहीं जिसे ख़ुशी और निराशा होती है, जो सबको होती है। ऐसा आदमी जो उनमें बहा जा रहा है, जैसे धारा बहा ले जाती है।

और क़ीमत आसपास के लोग उससे बहुत पहले चुकाते हैं जब वह ख़ुद चुकाता है। यही ब्योरा रखने लायक़ है। नतीजों से चलने वाला आदमी केवल दुखी नहीं होता; वह घर भर का मौसम बना देता है।