वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम्।कथं स पुरुषः पार्थ कं घातयति हन्ति कम्॥
vedāvināśinaṃ nityaṃ ya enam ajam avyayamkathaṃ sa puruṣaḥ pārtha kaṃ ghātayati hanti kam
शब्दार्थ
श्लोक कहता है
यदि तुम इसे अविनाशी, अनन्त, अजन्मा और अपरिवर्तनीय जानते हो — तो अर्जुन, तुम किसे मार सकते हो, और किसे मरवा सकते हो?
सरल शब्दों में
कृष्ण तर्क को प्रश्न में बदलकर वापस थमा देते हैं।
यदि तुम सचमुच जानते हो कि व्यक्ति है क्या, तो तुम्हारे मारने के लिए बचा कौन?
ध्यान दीजिए कि वे दोनों भूमिकाएँ ढँक लेते हैं। केवल वह नहीं जो प्रहार करता है, बल्कि वह भी जो प्रहार करवाता है। अर्जुन किसी और से बाण चलवाकर इससे बच नहीं सकता।
आपने इसे कहाँ महसूस किया है
आप हफ़्तों चिन्ता करते हैं कि निर्णय सुनाने वाले आप ही होंगे। फिर पता चलता है कि निर्णय महीनों पहले हो चुका था, और कमरे में बैठे किसी ने नहीं लिया था। आपका हिस्सा असली था। वह बस कभी वह हिस्सा नहीं था जिस पर आपकी नींद उड़ी थी।
और गहराई में
दोनों क्रियाएँ सावधानी से काम कर रही हैं। हन्ति है मारता है। घातयति है मरवाता है।
अध्याय १ का अर्जुन का पूरा पक्ष कर्तापन पर टिका था — दोष उसका होगा, हाथ उसका होगा। यह श्लोक दोनों दरवाज़े एक साथ बन्द कर देता है। यदि आधार सही है, तो न सीधा कर्म और न उसका प्रबन्ध आपको ऐसे अन्त का कर्ता बनाता है जो हो ही नहीं सकता।
पर पहला शब्द देखिए: वेद — जानता है। पूरा वाक्य सशर्त है। कृष्ण यह नहीं कह रहे कि कोई नहीं मारता। वे कह रहे हैं कि जो इसे सचमुच देख लेता है, उसके लिए यह प्रश्न घुल जाता है।
वह शर्त ईमानदार है, और वह मायने रखती है। अर्जुन अभी यह जानता नहीं। उसे यह बताया गया है, जो अलग बात है — जैसा श्लोक २९ साफ़ कह देगा।
तो यह श्लोक तर्क का अन्त नहीं है। यह उस जगह का वर्णन है जहाँ तर्क ले जाता है, और उसे ऐसे व्यक्ति को दिखाया जा रहा है जो अभी वहाँ खड़ा नहीं है।