Gita Explained
कृष्ण कहते हैं2.42

यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः।वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीति वादिनः॥

yāmimāṃ puṣpitāṃ vācaṃ pravadanty-avipaścitaḥveda-vāda-ratāḥ pārtha nānyad astīti vādinaḥkāmātmānaḥ swarga-parā janma-karma-phala-pradāmkriyā-viśeṣa-bahulāṃ bhogaiśwarya-gatiṃ prati

शब्दार्थ
yām imām: all thesepuṣpitām: floweryvācam: wordspravadanti: speakavipaścitaḥ: those with limited understandingveda-vāda-ratāḥ: attached to the flowery words of the Vedaspārtha: Arjun, the son of Prithana anyat: no otherasti: isiti: thusvādinaḥ: advocatekāma-ātmānaḥ: desirous of sensual pleasureswarga-parāḥ: aiming to achieve the heavenly planetsjanma-karma-phala: high birth and fruitive resultspradāṃ: awardingkriyā-viśeṣa: pompous ritualistic ceremoniesbahulām: variousbhoga: gratificationaiśwarya: luxurygatim: progressprati: toward

श्लोक कहता है

अर्जुन, कुछ लोग फूलों जैसी बातों में लगे रहते हैं और शास्त्र के अक्षरों में ही रस लेते हैं। वे कहते हैं कि इससे आगे कुछ है ही नहीं।

सरल शब्दों में

कृष्ण धर्म की आलोचना शुरू करते हैं - ठीक-ठीक कहें तो उसे बरतने के एक ढंग की।

फूलों जैसे शब्द। पाठ में ही रस। और वह पकड़ में आने वाला वाक्यांश: और कुछ है ही नहीं।

ये अधार्मिक लोग नहीं हैं। ये श्रद्धालु हैं, और यही मुख्य बात है।

आपने इसे कहाँ महसूस किया है

आपके चचेरे भाई को तबले का हर नियम आता है - हर सिद्धान्त, हर घराना, और हर वह ग़लती जो दूसरे बजाने वाले करते हैं। उन्होंने नौ साल से किसी के सामने नहीं बजाया। उनका ज्ञान असली है और पूरा है। बस वह भीतर जाने का रास्ता होना छोड़कर ख़ुद पूरी चीज़ बन गया।

और गहराई में

पाठकों को अचरज होता है कि गीता, स्वयं एक शास्त्र होकर, शास्त्र-पालन की तीखी आलोचना रखती है। समझना चाहिए कि हमला किस पर है।

वेदवादरताः - वेद के वचनों में रमे हुए। निशाना एक ख़ास धार्मिक शैली है: फल पाने के लिए कर्मकाण्ड करना, और पाठ को उन्हें उत्पन्न करने की भरोसेमन्द मशीन मान लेना।

कृष्ण को वेद पर आपत्ति नहीं है। आपत्ति सौदे पर है। यह विधि करो, वह फल पाओ - जिससे पूरा धर्म बेहतर शब्दावली के साथ चीज़ें चाहने का ही विस्तार बन जाता है।

न अन्यदस्ति - और कुछ है ही नहीं। असली आरोप यही है। यह नहीं कि विधियों के काम करने के बारे में वे ग़लत हैं, बल्कि यह कि वे मानते हैं कि बस इतना ही है।

बाक़ी गीता पढ़ने के लिए यह मायने रखता है, क्योंकि यही आलोचना पुस्तक के वर्णित लगभग हर मार्ग पर मुड़ेगी। प्रतिष्ठा के लिए किया गया ज्ञान, प्रशंसा के लिए किया गया संन्यास, लाभ के लिए की गई भक्ति। हर बार रूप ठीक रहता है और प्रेरणा ने उसे खोखला कर दिया होता है।