Gita Explained
कर्म का मार्ग — Kangra miniature

अध्याय / १८

कर्म का मार्ग

कर्मयोगः

Karma Yoga · ४३ श्लोक

अर्जुन पूछता है कि यदि समझ कर्म से श्रेष्ठ है, तो मुझे इस भयानक युद्ध में क्यों धकेल रहे हैं? कृष्ण कहते हैं कि कर्म न करना किसी के वश में नहीं। चुप बैठना भी एक चुनाव है, जिसके परिणाम हैं। प्रश्न कभी यह था ही नहीं कि कर्म करें या नहीं, केवल यह कि किसके लिए करें।

यह अध्याय आपको कहाँ छोड़ता है

पीछे हट जाने का विकल्प बन्द हो जाता है। बिना पकड़ के किया गया कर्म संसार में रहने वालों के लिए व्यावहारिक मार्ग बन जाता है।

श्लोक

संस्कृत पूर्ण · व्याख्या जारी है
  • अध्याय · श्लोक

    ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन।तत्किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव॥

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  • अध्याय · श्लोक

    व्यामिश्रेणेव वाक्येन बुद्धिं मोहयसीव मे ।तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमाप्नुयाम्॥

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  • अध्याय · श्लोक

    लोकेऽस्मिन्द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ।ज्ञानयोगेन सांख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम्॥

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  • अध्याय · श्लोक

    न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते।न च संन्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति॥

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  • अध्याय · श्लोक

    न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् ।कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः॥

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  • अध्याय · श्लोक

    कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन्।इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते॥

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  • अध्याय · श्लोक

    यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन।कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते॥

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  • अध्याय · श्लोक

    नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः।शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्ध्येदकर्मणः॥

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  • अध्याय · श्लोक

    यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः।तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसंगः समाचर॥

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  • अध्याय · श्लोक १०

    सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः।अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक्॥

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  • अध्याय · श्लोक ११

    देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः।परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ॥

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  • अध्याय · श्लोक १२

    इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः।तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुङ्क्ते स्तेन एव सः॥

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  • अध्याय · श्लोक १३

    यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः।भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात्॥

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  • अध्याय · श्लोक १४

    अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः।यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः॥

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  • अध्याय · श्लोक १५

    कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम्।तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम्॥

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  • अध्याय · श्लोक १६

    एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः।अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति॥

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  • अध्याय · श्लोक १७

    यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः।आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते॥

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  • अध्याय · श्लोक १८

    नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन ।न चास्य सर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यपाश्रयः॥

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  • अध्याय · श्लोक १९

    तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर।असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पूरुषः॥

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  • अध्याय · श्लोक २०

    कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः।लोकसंग्रहमेवापि संपश्यन्कर्तुमर्हसि॥

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  • अध्याय · श्लोक २१

    यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः।स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥

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  • अध्याय · श्लोक २२

    न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किञ्चन।नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि॥

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  • अध्याय · श्लोक २३

    यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः।मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः॥

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  • अध्याय · श्लोक २४

    उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम्।सङ्करस्य च कर्ता स्यामुपहन्यामिमाः प्रजाः॥

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  • अध्याय · श्लोक २५

    सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत ।कुर्याद्विद्वांस्तथासक्तश्चिकीर्षुर्लोकसंग्रहम्॥

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  • अध्याय · श्लोक २६

    न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसङ्गिनाम्।जोषयेत्सर्वकर्माणि विद्वान् युक्तः समाचरन्॥

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  • अध्याय · श्लोक २७

    प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः।अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताऽहमिति मन्यते॥

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  • अध्याय · श्लोक २८

    तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः।गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते॥

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  • अध्याय · श्लोक २९

    प्रकृतेर्गुणसम्मूढाः सज्जन्ते गुणकर्मसु।तानकृत्स्नविदो मन्दान्कृत्स्नविन्न विचालयेत्॥

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  • अध्याय · श्लोक ३०

    मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याध्यात्मचेतसा।निराशीर्निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वरः॥

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  • अध्याय · श्लोक ३१

    ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवाः।श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते तेऽपि कर्मभिः॥

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  • अध्याय · श्लोक ३२

    ये त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुतिष्ठन्ति मे मतम्।सर्वज्ञानविमूढांस्तान्विद्धि नष्टानचेतसः॥

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  • अध्याय · श्लोक ३३

    सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि।प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति॥

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  • अध्याय · श्लोक ३४

    इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ।तयोर्न वशमागच्छेत्तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ॥

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  • अध्याय · श्लोक ३५

    श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः॥

    Better your own work, done badly, than someone else's work done well. It is better to die doing your own work. Someone else's work brings danger.

    Krishna is talking about the pull to live a life that is not yours.

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  • अध्याय · श्लोक ३६

    अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पूरुषः।अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजितः॥

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  • अध्याय · श्लोक ३७

    काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः।महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम्॥

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  • अध्याय · श्लोक ३८

    धूमेनाव्रियते वह्निर्यथाऽऽदर्शो मलेन च।यथोल्बेनावृतो गर्भस्तथा तेनेदमावृतम्॥

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  • अध्याय · श्लोक ३९

    आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा।कामरूपेण कौन्तेय दुष्पूरेणानलेन च॥

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  • अध्याय · श्लोक ४०

    इन्द्रियाणि मनो बुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते।एतैर्विमोहयत्येष ज्ञानमावृत्य देहिनम्॥

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  • अध्याय · श्लोक ४१

    तस्मात्त्वमिन्द्रियाण्यादौ नियम्य भरतर्षभ।पाप्मानं प्रजहि ह्येनं ज्ञानविज्ञाननाशनम्॥

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  • अध्याय · श्लोक ४२

    इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः।मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धेः परतस्तु सः॥

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  • अध्याय · श्लोक ४३

    एवं बुद्धेः परं बुद्ध्वा संस्तभ्यात्मानमात्मना।जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम्॥

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