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ज्ञान, कर्म और त्याग - Kangra miniature

अध्याय ४ / १८

ज्ञान, कर्म और त्याग

ज्ञानकर्मसंन्यासयोगः

Jñāna-karma-sannyāsa Yoga · ४२ श्लोक

कृष्ण कहते हैं कि यह शिक्षा प्राचीन है और वे इसे पहले भी दे चुके हैं। अर्जुन पूछता है कि यह कैसे सम्भव है, जब हम दोनों अभी जीवित हैं। इसी उत्तर से यह खुलता है कि कृष्ण कौन हैं, और जब सब कुछ बिगड़ने लगता है तब दिव्यता रूप क्यों धारण करती है।

यह अध्याय आपको कहाँ छोड़ता है

गुरु अब केवल मित्र और सारथी नहीं रह जाते। शिक्षा को एक परम्परा मिलती है, और कर्म को कर्तव्य से गहरा कारण।

श्लोक

४२ / ४२ का अर्थ