
अध्याय ४ / १८
ज्ञान, कर्म और त्याग
ज्ञानकर्मसंन्यासयोगः
Jñāna-karma-sannyāsa Yoga · ४२ श्लोक
कृष्ण कहते हैं कि यह शिक्षा प्राचीन है और वे इसे पहले भी दे चुके हैं। अर्जुन पूछता है कि यह कैसे सम्भव है, जब हम दोनों अभी जीवित हैं। इसी उत्तर से यह खुलता है कि कृष्ण कौन हैं, और जब सब कुछ बिगड़ने लगता है तब दिव्यता रूप क्यों धारण करती है।
यह अध्याय आपको कहाँ छोड़ता है
गुरु अब केवल मित्र और सारथी नहीं रह जाते। शिक्षा को एक परम्परा मिलती है, और कर्म को कर्तव्य से गहरा कारण।
श्लोक
संस्कृत पूर्ण · व्याख्या जारी हैअध्याय ४ · श्लोक १
इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम्।विवस्वान् मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत्॥
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अध्याय ४ · श्लोक २
एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः।स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप॥
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अध्याय ४ · श्लोक ३
स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः।भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम्॥
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अध्याय ४ · श्लोक ४
अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः।कथमेतद्विजानीयां त्वमादौ प्रोक्तवानिति॥
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अध्याय ४ · श्लोक ५
बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन।तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परन्तप॥
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अध्याय ४ · श्लोक ६
अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन्।प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय संभवाम्यात्ममायया॥
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अध्याय ४ · श्लोक ७
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।अभ्युत्थानमधर्मस्य तदाऽऽत्मानं सृजाम्यहम्॥
Whenever what is right grows weak, Bharata, and what is wrong rises up, then I send myself forth.
This is a promise, and it is the most quoted promise in the book.
व्याख्या पढ़ेंअध्याय ४ · श्लोक ८
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे॥
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अध्याय ४ · श्लोक ९
जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः।त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन॥
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अध्याय ४ · श्लोक १०
वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः।बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागताः॥
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अध्याय ४ · श्लोक ११
ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः॥
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अध्याय ४ · श्लोक १२
काङ्क्षन्तः कर्मणां सिद्धिं यजन्त इह देवताः।क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा॥
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अध्याय ४ · श्लोक १३
चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः।तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम्॥
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अध्याय ४ · श्लोक १४
न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा।इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते॥
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अध्याय ४ · श्लोक १५
एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः।कुरु कर्मैव तस्मात्त्वं पूर्वैः पूर्वतरं कृतम्॥
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अध्याय ४ · श्लोक १६
किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः।तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्॥
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अध्याय ४ · श्लोक १७
कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः।अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः॥
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अध्याय ४ · श्लोक १८
कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः।स बुद्धिमान् मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत्॥
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अध्याय ४ · श्लोक १९
यस्य सर्वे समारम्भाः कामसङ्कल्पवर्जिताः।ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुः पण्डितं बुधाः॥
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अध्याय ४ · श्लोक २०
त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं नित्यतृप्तो निराश्रयः।कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किञ्चित्करोति सः॥
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अध्याय ४ · श्लोक २१
निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः।शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्॥
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अध्याय ४ · श्लोक २२
यदृच्छालाभसन्तुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सरः।समः सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यते॥
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अध्याय ४ · श्लोक २३
गतसङ्गस्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थितचेतसः।यज्ञायाचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते॥
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अध्याय ४ · श्लोक २४
ब्रह्मार्पणं ब्रह्महविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम्।ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना॥
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अध्याय ४ · श्लोक २५
दैवमेवापरे यज्ञं योगिनः पर्युपासते।ब्रह्माग्नावपरे यज्ञं यज्ञेनैवोपजुह्वति॥
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अध्याय ४ · श्लोक २६
श्रोत्रादीनीन्द्रियाण्यन्ये संयमाग्निषु जुह्वति।शब्दादीन्विषयानन्य इन्द्रियाग्निषु जुह्वति॥
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अध्याय ४ · श्लोक २७
सर्वाणीन्द्रियकर्माणि प्राणकर्माणि चापरे।आत्मसंयमयोगाग्नौ जुह्वति ज्ञानदीपिते॥
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अध्याय ४ · श्लोक २८
द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा योगयज्ञास्तथापरे।स्वाध्यायज्ञानयज्ञाश्च यतयः संशितव्रताः॥
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अध्याय ४ · श्लोक २९
अपाने जुह्वति प्राणं प्राणेऽपानं तथापरे ।प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणाः॥
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अध्याय ४ · श्लोक ३०
अपरे नियताहाराः प्राणान्प्राणेषु जुह्वति।सर्वेऽप्येते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मषाः॥
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अध्याय ४ · श्लोक ३१
यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम् ।नायं लोकोऽस्त्ययज्ञस्य कुतोऽन्यः कुरुसत्तम॥
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अध्याय ४ · श्लोक ३२
एवं बहुविधा यज्ञा वितता ब्रह्मणो मुखे।कर्मजान्विद्धि तान्सर्वानेवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे॥
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अध्याय ४ · श्लोक ३३
श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परन्तप।सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते॥
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अध्याय ४ · श्लोक ३४
तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया।उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः॥
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अध्याय ४ · श्लोक ३५
यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव।येन भूतान्यशेषेण द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि॥
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अध्याय ४ · श्लोक ३६
अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृत्तमः।सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं सन्तरिष्यसि॥
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अध्याय ४ · श्लोक ३७
यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन।ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा॥
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अध्याय ४ · श्लोक ३८
न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते।तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति॥
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अध्याय ४ · श्लोक ३९
श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः।ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति॥
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अध्याय ४ · श्लोक ४०
अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति।नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः॥
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अध्याय ४ · श्लोक ४१
योगसंन्यस्तकर्माणं ज्ञानसंछिन्नसंशयम्।आत्मवन्तं न कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय॥
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अध्याय ४ · श्लोक ४२
तस्मादज्ञानसंभूतं हृत्स्थं ज्ञानासिनाऽऽत्मनः।छित्त्वैनं संशयं योगमातिष्ठोत्तिष्ठ भारत॥
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