Gita Explained
कृष्ण कहते हैं7.10

बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम्।बुद्धिर्बुद्धिमतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम्॥

bījaṃ māṃ sarva-bhūtānāṃ viddhi pārtha sanātanambuddhir buddhimatām asmi tejas tejasvinām aham

शब्दार्थ
bījam — the seedmām — mesarva-bhūtānām — of all beingsviddhi — knowpārtha — Arjun, the son of Prithasanātanam — the eternalbuddhiḥ — intellectbuddhi-matām — of the intelligentasmi — (I) amtejaḥ — splendortejasvinām — of the splendidaham — I

श्लोक कहता है

पार्थ, मुझे सब प्राणियों का बीज जानो — वह बीज जो सदा से है। मैं बुद्धिमानों की बुद्धि हूँ और तेजस्वियों का तेज।

सरल शब्दों में

बीजम् — बीज। निर्माता नहीं, स्वामी नहीं, राजा नहीं। बीज।

बीज पेड़ के ऊपर खड़ा होकर उसे निर्देश नहीं देता। वह उसके भीतर है, चुक चुका है, और पेड़ उसी बीज का आगे बढ़ना है।

फिर सूची में दो और चीज़ें: बुद्धि, और वह जो किसी व्यक्ति को चमका देता है।

आपने इसे कहाँ महसूस किया है

खाने के बाद कोई आम की गुठली आँगन के कोने में फेंककर भूल जाता है। दो बरसातों बाद वहाँ एक पौधा खड़ा है जिसे किसी ने न लगाया, न सींचा, न माँगा। पूरा पेड़ अँगूठे जितनी चीज़ में मुड़ा हुआ था। उसमें समय और बारिश के सिवा कुछ नहीं जोड़ा गया।

और गहराई में

किसी ईश्वर के लिए अपने को बीज कहना अजीब है, और यह अजीबपन ही शिक्षा है।

आम तस्वीर में भगवान संसार के बाहर हैं, उसे वैसे बनाते हुए जैसे बढ़ई कुर्सी बनाता है। बढ़ई कुर्सी छोड़कर घर जा सकता है। बीज पेड़ को छोड़कर नहीं जा सकता। वह पेड़ के बग़ल में खड़ा नहीं है; वह पेड़ का ही पहला रूप है, और अब कहीं और है ही नहीं।

उसके साथ जुड़ा शब्द सनातनम् है, जिसका अर्थ है जिसका आरम्भ न हो। तो यह ऐसा बीज नहीं जिसे कभी अतीत में किसी ने बोया हो।

इसका व्यावहारिक सिरा यह है। अगर स्रोत चीज़ के पीछे नहीं, भीतर है, तो आपके साथ जो हो रहा है वह उनसे दूर नहीं हो रहा। ऊपर देखने से उनके मिलने की सम्भावना उतनी ही है जितनी सामने देखने से।