Gita Explained
कृष्ण कहते हैं7.20

कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञानाः प्रपद्यन्तेऽन्यदेवताः।तं तं नियममास्थाय प्रकृत्या नियताः स्वया॥

kāmais tais tair hṛta-jñānāḥ prapadyante ’nya-devatāḥtaṃ taṃ niyamam āsthāya prakṛtyā niyatāḥ svayā

शब्दार्थ
kāmaiḥ — by material desirestaiḥ taiḥ — by varioushṛta-jñānāḥ — whose knowledge has been carried awayprapadyante — surrenderanya — to otherdevatāḥ — celestial godstam tam — the variousniyamam — rules and regulationsāsthāya — followingprakṛtyā — by natureniyatāḥ — controlledsvayā — by their own

श्लोक कहता है

जिनकी समझ इस या उस कामना से हर ली गई है, वे दूसरे देवताओं की ओर मुड़ते हैं। वे यह या वह नियम निभाते हैं, अपनी ही प्रकृति से बँधे हुए।

सरल शब्दों में

ध्यान देने लायक़ वाक्यांश आख़िरी है: प्रकृत्या नियताः स्वया — अपनी ही प्रकृति से बँधे हुए।

यह आरोप नहीं है। यह स्पष्टीकरण है।

लोग वही पकड़ते हैं जो सबसे पास है, और सबसे पास क्या है यह उनकी परवरिश तय कर चुकी होती है।

आपने इसे कहाँ महसूस किया है

नतीजे आने से पहले वाले हफ़्ते में वे लोग भी अचानक प्रार्थना करने लगते हैं जिन्होंने पूरे साल नहीं की। एक मित्र जो हर दावत में धर्म पर बहस करता है, चुपचाप वह छोटी-सी चीज़ कर रहा होता है जो उसकी माँ ने उसे सिखाई थी। इसमें शर्म की कोई बात नहीं। डर आपसे वही पकड़वाता है जो हाथ के सबसे पास हो, और सबसे पास क्या है यह इम्तिहान से बहुत पहले तय हो चुका था।

और गहराई में

यहाँ से चार श्लोक शुरू होते हैं जिन्हें उदार भी पढ़ा गया है और तिरस्कारपूर्ण भी, और दोनों पाठ ईमानदारी से उपलब्ध हैं।

उदार वाला: कृष्ण किसी को मूर्ख नहीं कहते कि वह कहीं और पूजा करता है। वे कहते हैं कि उसकी समझ चाहत से हर ली गई — वही चाहत जो हम सब लाते हैं — और वह अपनी प्रकृति के पीछे चल रहा है, जो अपराध नहीं है।

तिरस्कार वाला: उन्हें फिर भी भटका हुआ बताया गया है, और अगले तीन श्लोक उनके पाए हुए को छोटा कहते हैं। यह क्रम है, चाहे कितनी ही भलमनसाहत से कहा गया हो।

दोनों पाठ में हैं और यह कह देना बेहतर है। जो पाठ में नहीं है वह उनमें दख़ल देने का कोई निर्देश है, और वह अनुपस्थिति बहुत लम्बे समय से टिकी हुई है। यह हिस्सा और चाहे जो करे, किसी को दूसरे की पूजा सुधारने की इजाज़त नहीं देता।