Gita Explained
कृष्ण कहते हैं7.23

अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम्।देवान्देवयजो यान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि॥

antavat tu phalaṃ teṣāṃ tad bhavatyalpa-medhasāmdevān deva-yajo yānti mad-bhaktā yānti mām api

शब्दार्थ
anta-vat — perishabletu — butphalam — fruitteṣām — by themtat — thatbhavati — isalpa-medhasām — people of small understandingdevān — to the celestial godsdeva-yajaḥ — the worshipers of the celestial godsyānti — gomat — mybhaktāḥ — devoteesyānti — gomām — to meapi — whereas

श्लोक कहता है

पर ऐसे लोगों को जो मिलता है उसका अन्त है — उन्होंने पूरी बात सोची नहीं। देवताओं को पूजने वाले देवताओं तक जाते हैं। जो मेरे हैं वे मुझ तक आते हैं।

सरल शब्दों में

आपत्ति यह नहीं कि वह विफल हो जाता है। आपत्ति यह है कि वह ख़त्म हो जाता है।

अन्तवत् — जिसका अन्त हो। चीज़ मिलती है, और फिर चीज़ ख़त्म हो जाती है।

अल्पमेधसाम् वह निर्दय वाक्यांश है: कम समझ वाले। यह अध्याय हमेशा कोमल नहीं है।

आपने इसे कहाँ महसूस किया है

आप दो साल से एक मोटरसाइकिल चाहते थे। आपने बचाया, आपने ख़रीदी, और लगभग एक महीने तक वह सुबह उठते ही पहला ख़याल थी। फिर वह वह चीज़ बन गई जिससे आप दफ़्तर जाते हैं। कुछ बिगड़ा नहीं और किसी ने ठगा नहीं। वह बस उस चीज़ होना बन्द हो गई जो आप चाहते थे।

और गहराई में

यहाँ की आलोचना गणित की है, नैतिकता की नहीं।

सीमित चाहत को सीमित उत्तर मिलता है। नतीजा माँगिए और नतीजा ही आता है, और नतीजे समय के बने होते हैं। वे आते हैं, भोगे जाते हैं, और वह फ़र्श बन जाते हैं जिस पर खड़े होकर आप अगली चीज़ ढूँढ़ते हैं। इसमें कुछ पापी नहीं है। सौदे का आकार ही यही है।

अल्पमेधसाम्, कम समझ वाले, वह वाक्यांश है जो चुभता है, और अध्याय में यही वह जगह है जहाँ पाठक सबसे ज़्यादा नीचा दिखाया हुआ महसूस करते हैं। वह प्रतिक्रिया जायज़ है। गीता इससे उदार भाषा बरत सकती है और यहाँ नहीं बरतती।

चुभन के बाद जो बचता है वह वह निरीक्षण है जिसे कोई भी जाँच सकता है। पिछली उस चीज़ के बारे में सोचिए जो आपने बहुत चाही और पाई। गिनिए कि वह कितने दिन वह चीज़ बनी रही जो आप चाहते थे।