Gita Explained
कृष्ण कहते हैं8.18

अव्यक्ताद्व्यक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे।रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसंज्ञके॥

avyaktād vyaktayaḥ sarvāḥ prabhavantyahar-āgamerātryāgame pralīyante tatraivāvyakta-sanjñake

शब्दार्थ
avyaktāt — from the unmanifestedvyaktayaḥ — the manifestedsarvāḥ — allprabhavanti — emanateahaḥ-āgame — at the advent of Brahma’s dayrātri-āgame — at the fall of Brahma’s nightpralīyante — they dissolvetatra — into thateva — certainlyavyakta-sanjñake — in that which is called the unmanifest

श्लोक कहता है

दिन के आते ही सब व्यक्त चीज़ें अव्यक्त से प्रकट होती हैं। रात के आते ही वे उसी अव्यक्त में घुल जाती हैं।

सरल शब्दों में

प्रकट होना और घुल जाना, एक लय की तरह बताया गया।

कोई आपदा नहीं, कोई दंड नहीं, कुछ भी ग़लत होता हुआ नहीं।

भीतर, और बाहर, जैसे साँस चलती है।

आपने इसे कहाँ महसूस किया है

आप सो जाते हैं, और कुछ घंटों के लिए न आप होते हैं न दुनिया। आपको वह नुक़सान जैसा महसूस नहीं होता, क्योंकि वहाँ कोई है ही नहीं जिसे नुक़सान हो। सुबह सब कुछ क्रम से लौट आता है — कमरा, आपका नाम, आपकी उम्र, और वह चिन्ता जो कल थी।

और गहराई में

घुल जाना नष्ट होना नहीं है, और इस पूरे प्रसंग का सारा दिलासा इसी अन्तर पर टिका है।

अव्यक्त का अर्थ है अप्रकट: गया नहीं, नष्ट नहीं, बस इस समय दिख नहीं रहा। चीज़ें उसमें वैसे लौटती हैं जैसे लहर पानी में लौटती है, और लहर के ख़त्म होने से पानी घटता नहीं।

हर रात आप इसका छोटा रूप करते हैं और उससे किसी को डर नहीं लगता। चेतना सिमट जाती है, दुनिया दिखाई जानी बन्द हो जाती है, और आप सुबह लौट आते हैं, बिना पुर्ज़ों से दोबारा जोड़े गए।

यह अन्त के बारे में सोचने का एक ऐसा तरीक़ा देता है जो न इनकार है न दहशत। किसी चीज़ का न दिखना और किसी चीज़ का न होना, दो अलग तथ्य हैं, और पहले को लेकर हमारा लगभग सारा डर दूसरे से उधार लिया हुआ है।