Gita Explained
कृष्ण कहते हैं9.15

ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये यजन्तो मामुपासते।एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतोमुखम्॥

jñāna-yajñena cāpyanye yajanto mām upāsateekatvena pṛthaktvena bahudhā viśvato-mukham

शब्दार्थ
jñāna-yajñena — yajña of cultivating knowledgeca — andapi — alsoanye — othersyajantaḥ — worshipmām — meupāsate — worshipekatvena — undifferentiated onenesspṛthaktvena — separatelybahudhā — variousviśwataḥ-mukham — the cosmic form

श्लोक कहता है

और कुछ लोग ज्ञान का यज्ञ अर्पित करके मेरी उपासना करते हैं। कभी एक की तरह, कभी अनेक की तरह, कभी सब ओर मुख किए हुए की तरह।

सरल शब्दों में

भगवान की तीन काफ़ी अलग तस्वीरें, एक ही पंक्ति में गिनाई हुई।

एक की तरह, अविभाजित। अनेक की तरह, हर अलग चीज़ में। एक ही उपस्थिति की तरह जो एक साथ हर ओर मुड़ी है।

कोई क्रम नहीं दिया गया। तीनों को उपासना कहा गया है।

आपने इसे कहाँ महसूस किया है

तीन विद्यार्थी एक ही विषय तीन अलग तरीक़ों से दोहराते हैं। एक पूरे पन्ने पर आरेख बनाती है। एक दीवार की ओर देखकर ज़ोर से पढ़ता है। एक अपने छोटे भाई को तब तक समझाती है जब तक वह सवाल पूछना बन्द न कर दे। तीनों इम्तिहान में अच्छे उत्तर लिखते हैं, और परचे देखकर शिक्षक यह नहीं बता सकते कि किसने कौन-सा तरीक़ा अपनाया था।

और गहराई में

बड़ी दार्शनिक स्थितियों को साथ-साथ रख देना और किसी एक को न चुनना असामान्य है, और यहाँ जानबूझकर है।

दिव्य को एक अविभाजित सत्ता मानना, उसे सचमुच अनेक मानना, उसे हर ओर मुख किए एक उपस्थिति मानना — ये तीन मनोदशाएँ नहीं हैं। ये तीन सम्प्रदाय बन गए, और उनके उत्तराधिकारी सदियों बहस करते रहे। श्लोक उन्हें एक क़तार में रखता है और हर एक को उपासना कहता है।

यह कहना वही नहीं है कि कुछ भी मायने नहीं रखता या सब मत बराबर हैं। कृष्ण इसी अध्याय में तीखे भेद करते हैं। यह उससे सँकरा है: इस ख़ास सवाल पर एक से ज़्यादा उत्तर खड़े रहने दिए जा रहे हैं।

पाठक के लिए इससे उस चीज़ का ताप घटता है जो बहुत सारी अनावश्यक बेचैनी पैदा करती है। शुरू करने की इजाज़त पाने से पहले आपको यह तय करना ज़रूरी नहीं कि भगवान हैं क्या।