Gita Explained
कृष्ण कहते हैं9.20

त्रैविद्या मां सोमपाः पूतपापा यज्ञैरिष्ट्वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते।ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोक मश्नन्ति दिव्यान्दिवि देवभोगान्॥

trai-vidyā māṃ soma-pāḥ pūta-pāpāyajñair iṣṭvā svar-gatiṃ prārthayantete puṇyam āsādya surendra-lokamaśnanti divyān divi deva-bhogān

शब्दार्थ
trai-vidyāḥ — the science of karm kāṇḍ (Vedic Rituals)mām — mesoma-pāḥ — drinkers of the Soma juicepūta — purifiedpāpāḥ — sinsyajñaiḥ — through sacrificesiṣṭvā — worshipsvaḥ-gatim — way to the abode of the king of heavenprārthayante — seekte — theypuṇyam — piousāsādya — attainsura-indra — of Indralokam — abodeaśnanti — enjoydivyān — celestialdivi — in heavendeva-bhogān — the pleasures of the celestial gods

श्लोक कहता है

तीनों वेद जानने वाले, सोम पीने वाले, पाप से धुले हुए, यज्ञों से मेरी उपासना करते हैं और स्वर्ग का रास्ता माँगते हैं। देवराज के पवित्र लोक तक पहुँचकर वे देवताओं के भोग भोगते हैं।

सरल शब्दों में

यहाँ कोई उपहास नहीं है, और यह देखने लायक़ है।

ये लोग काम ठीक से करते हैं। इन्हें पाप से धुला हुआ बताया गया है। ये स्वर्ग माँगते हैं और इन्हें स्वर्ग मिलता है।

व्यवस्था का वर्णन ठीक वैसे किया जा रहा है जैसा उसका वादा था।

आपने इसे कहाँ महसूस किया है

आपके पिता ने पन्द्रह साल एक योजना में पैसा डाला और उसने ठीक उतना ही दिया जितना वादा था, रुपये-रुपये तक। कुछ भी ग़लत बेचा नहीं गया और किसी ने ठगा नहीं। उन्हें ठीक वही मिला जो उन्होंने ख़रीदा था, उसी तारीख़ को जो बताई गई थी, और ख़रीदना समझदारी की बात थी।

और गहराई में

किसी बात से असहमत होने से पहले उसका सही वर्णन कर देना इस पुस्तक की आदत है, और वह यहाँ दिख रही है।

उस समय की कर्मकाण्ड व्यवस्था सही ढंग से किए जाने पर नतीजों का वादा करती थी। कृष्ण यह नहीं कहते कि वादा धोखा था। वे कहते हैं कि वह निभाया जाता है। यज्ञ काम करते हैं, पुण्य असली है, स्वर्ग मिलता है और भोगा जाता है।

अगले श्लोक की आलोचना कैसे पढ़ी जाए, इसके लिए यह मायने रखता है। वह पर्दाफ़ाश नहीं है। किसी से यह नहीं कहा जा रहा कि उसे बेवक़ूफ़ बनाया गया था।

विषय से अलग, इस तरीक़े में भी कुछ उधार लेने लायक़ है। किसी असहमति का सबसे मज़बूत रूप वह है जो सामने वाले की बात को पहले उसके सबसे अच्छे रूप में रखे, और यह देखने लायक़ है कि ऐसा कितनी कम बार होता है। गीता यह अपने ही समय के प्रमुख धर्म के साथ करती है, उसी अध्याय में जिसमें वह उसके ख़िलाफ़ तर्क दे रही है।