Gita Explained
कृष्ण कहते हैं9.3

अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परन्तप।अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि॥

aśraddadhānāḥ puruṣā dharmasyāsya parantapaaprāpya māṃ nivartante mṛtyu-samsāra-vartmani

शब्दार्थ
aśraddadhānāḥ — people without faithpuruṣāḥ — (such) personsdharmasya — of dharmaasya — thisparantapa — Arjun, conqueror the enemiesaprāpya — without attainingmām — menivartante — come backmṛtyu — deathsamsāra — material existencevartmani — in the path

श्लोक कहता है

जो लोग इस धर्म पर अपना भार नहीं डालते, वे मुझ तक नहीं पहुँचते, परन्तप। वे लौट आते हैं, मरने और फिर जन्मने के रास्ते पर।

सरल शब्दों में

अश्रद्दधानाः — श्रद्धा के बिना।

इसका अनुवाद आमतौर पर अविश्वासी होता है, जिससे यह विश्वास की परीक्षा जैसा लगने लगता है। यह टेक न लगाने के ज़्यादा नज़दीक है।

आप किसी बात से पूरी तरह सहमत हो सकते हैं और उस पर कभी अपना भार न डालें।

आपने इसे कहाँ महसूस किया है

आप साइकिल चलाना सीखते हुए एक पैर सड़क से इंच भर ऊपर लटकाए नहीं रह सकते। लटकाए रखना समझदारी है। वही ठीक वह वजह भी है कि आप बार-बार डगमगाकर रुक जाते हैं। किसी न किसी पल पैर ऊपर आना ही है, और यह हिस्सा आपकी जगह कोई नहीं कर सकता।

और गहराई में

इस पुस्तक में श्रद्धा भार का मामला है, राय का नहीं, और इसी अन्तर से तय होता है कि यह श्लोक कैसा पढ़ा जाए।

श्रद्धा वह है जिस पर आप सचमुच टिकते हैं। वह व्यवहार में दिखती है, इसमें नहीं कि पूछने पर आप क्या कहेंगे। कोई आदमी किसी मान्यता को मज़बूती से थाम सकता है और कभी एक बार भी ऐसे काम न करे जैसे वह सच हो, और इस परिभाषा से उसकी उसमें श्रद्धा है ही नहीं।

ऐसे पढ़ें तो श्लोक अविश्वासियों पर तनी धमकी नहीं रह जाता। वह एक यन्त्र का वर्णन है। जिस पर आप भार डालने से इनकार करते हैं, वह आपको थाम नहीं सकता, और यह दंड नहीं है। भार का अर्थ ही यही है।

इससे व्यावहारिक सवाल काफ़ी ठोस हो जाता है। यह नहीं कि आप इसमें से कुछ मानते हैं या नहीं, बल्कि यह कि आपके हफ़्ते में कुछ ऐसा है जो मानने पर अलग दिखता।