Gita Explained
कृष्ण कहते हैं10.4

बुद्धिर्ज्ञानमसंमोहः क्षमा सत्यं दमः शमः।सुखं दुःखं भवोऽभावो भयं चाभयमेव च॥

buddhir jñānam asammohaḥ kṣamā satyaṃ damaḥ śamaḥsukhaṃ duḥkhaṃ bhavo ’bhāvo bhayaṃ cābhayameva ca

शब्दार्थ
buddhiḥ — intellectjñānam — knowledgeasammohaḥ — clarity of thoughtkṣamā — forgivenesssatyam — truthfulnessdamaḥ — control over the sensesśamaḥ — control of the mindsukham — joyduḥkham — sorrowbhavaḥ — birthabhāvaḥ — deathbhayam — fearca — andabhayam — courageeva — certainlyca — and

श्लोक कहता है

बुद्धि, ज्ञान, भ्रम का न होना, क्षमा, सत्य, इन्द्रियों पर संयम और मन की शान्ति। सुख और दुख, होना और मिट जाना, भय, और निर्भयता —

सरल शब्दों में

गुणों की एक सूची, और देखिए कि इसमें क्या-क्या साथ रखा है।

क्षमा और सत्य, जिन्हें हम उपलब्धि मानते हैं। सुख और दुख, जिन्हें कोई चुनता नहीं। भय, और उसका न होना।

सब एक ही वाक्य में, और अन्तर बताने वाला कोई निशान नहीं।

आपने इसे कहाँ महसूस किया है

जिस सुबह सब कुछ बिगड़ चुका हो, उसी सुबह आप ख़ुद को हैरान कर देते हैं — किसी ऐसे आदमी के साथ धीरज से पेश आकर जो उसका हक़दार नहीं था। आपने तय नहीं किया था। वह बस आ गया, वैसे ही जैसे एक घंटे पहले ख़राब मूड आया था, और दोनों में आपका कहना बराबर ही चला।

और गहराई में

कमाए हुए गुणों और बिन कमाए हालात को एक ही सूची में रख देना यहाँ का क़दम है, और वह जानबूझकर है।

हम अपने भीतरी मौसम को दो ढेरों में बाँटते हैं। धीरज, ईमानदारी और स्पष्टता चरित्र वाले ढेर में जाते हैं, जिसका श्रेय हम लेते हैं। डर, दुख और सुस्ती परिस्थिति वाले ढेर में, जिसका दोष हम दिन पर डालते हैं। श्लोक ढेर अलग नहीं रखता। सूची की हर चीज़ एक ही स्रोत से उठती बताई गई है।

यह दोनों तरफ़ असहज है, जो इस बात का संकेत है कि यह चापलूसी नहीं है।

इससे अपनी ही अवस्थाओं के साथ एक स्थिर रिश्ता मिलता है। मंगलवार को जो धीरज आपने निभाया वह पूरी तरह आपका किया हुआ नहीं था, इसलिए बुधवार की झुँझलाहट भी पूरी तरह आपकी नाकामी नहीं है। दोनों आपके भीतर से गुज़रे। दोनों में से कोई आपका नाप नहीं है।