Gita Explained
कृष्ण कहते हैं15.3

न रूपमस्येह तथोपलभ्यते नान्तो न चादिर्न च संप्रतिष्ठा।अश्वत्थमेनं सुविरूढमूल मसङ्गशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा॥

na rūpam asyeha tathopalabhyatenānto na cādir na ca sampratiṣṭhāaśvattham enaṃ su-virūḍha-mūlamasaṅga-śastreṇa dṛḍhena chittvā

शब्दार्थ
na - notrūpam - formasya - of thisiha - in this worldtathā - as suchupalabhyate - is perceivedna - neitherantaḥ - endna - norca - alsoādiḥ - beginningna - neverca - alsosampratiṣṭhā - the basisaśvattham - sacred fig treeenam - thissu-virūḍha-mūlam - deep-rootedasaṅga-śastreṇa - by the axe of detachmentdṛḍhena - strongchittvā - having cut down

श्लोक कहता है

यहाँ उसका रूप पकड़ में नहीं आता - न अन्त, न आदि, न कोई आधार जिस पर वह टिका हो। गहरी जड़ों वाले इस पीपल को असङ्ग की दृढ़ कुल्हाड़ी से काट दो।

सरल शब्दों में

आप वृक्ष का आकार नहीं देख सकते, क्योंकि आप उसी के भीतर खड़े हैं।

कोई शुरुआत नहीं जिस पर उँगली रखी जाए। कोई अन्त नहीं। कोई फ़र्श नहीं जिसे जाँचा जा सके। कृष्ण यह पहेली सुलझाते नहीं। वे हाथ में औज़ार थमा देते हैं।

कुल्हाड़ी है असङ्ग - न चिपकना। वृक्ष पर गुस्सा नहीं। वृक्ष को समझ लेना भी नहीं। बस पकड़ ढीली करना, और काटता केवल वही है।

आपने इसे कहाँ महसूस किया है

आप और आपका छोटा भाई क़रीब साल भर से एक-दूसरे को चुभो रहे हैं। एक शाम आप हिसाब लगाने बैठते हैं कि शुरुआत कहाँ हुई। किसी चचेरी बहन की शादी में कही बात, उससे पहले पैसे की कोई बात, उससे भी पहले कुछ और। कोई पहली चाल मिलती ही नहीं, और उसकी सूची आपसे लम्बी है। बात इस बहस के जीतने से नहीं रुकती कि शुरू किसने किया। वह उस शाम रुकती है जब दोनों में से कोई जवाब न देने का तय करता है।

और गहराई में

न चिपकना यहाँ एक औज़ार की तरह सौंपा जा रहा है, मनोदशा की तरह नहीं, और यह फ़र्क़ सुनने से बड़ा है।

कुल्हाड़ी वह चीज़ है जिसे उठाकर चलाया जाता है। वह कोई भाव नहीं जिसके आने का इन्तज़ार किया जाए। असङ्ग को दृढ़ कहा गया है, और दृढ़ धार के बारे में कहते हैं, भावना के बारे में नहीं। इसे उस दिन भी काम में लाया जा सकता है जिस दिन भीतर ऐसा कुछ महसूस न हो रहा हो।

यह भी देखने लायक़ है कि क्या नहीं कहा गया। संसार से घृणा करके वृक्ष काटना नहीं। उससे लड़ना नहीं। इस पूरे मामले में पकड़ ही अकेली चीज़ है जो आपके हाथ में है, इसलिए छोड़ी भी वही जा सकती है। वृक्ष आपका दुश्मन नहीं है और उससे बदलने को कहा भी नहीं जा रहा।

यानी यह क़दम हमेशा उपलब्ध रहता है। उलझन चाहे जो हो, उसका जो सिरा आपके हाथ में है, वही सिरा आप छोड़ सकते हैं।