सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते।अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम्॥
sarva-bhūteṣu yenaikaṃ bhāvam avyayam īkṣateavibhaktaṃ vibhakteṣu taj jñānaṃ viddhi sāttvikam
शब्दार्थ
श्लोक कहता है
जिस ज्ञान से आप हर जीव में एक ही अविनाशी सत्ता देखते हैं, बँटे हुओं में अनबँटी - उस ज्ञान को सात्त्विक जानो।
सरल शब्दों में
सबसे अच्छा जानना, एक पंक्ति में।
सबमें एक चीज़ देखना। बँटे हुओं के बीच, अनबँटी।
ध्यान दीजिए कि वे यह नहीं कहते कि बँटवारे झूठे हैं। लोग सचमुच अलग-अलग हैं; उन्हें गिना जा सकता है। दावा यह है कि उस गिनती में कुछ अनबँटा मौजूद है।
आपने इसे कहाँ महसूस किया है
आपकी पुरानी शिक्षिका ने छब्बीस साल पाँच साल के बच्चों को पढ़ाया। पूछिए कि क्या बच्चे बदले हैं और वे कहती हैं नहीं। कपड़े बदलते हैं। खिलौने बदलते हैं। जो शब्द वे बरतते हैं वे हर कुछ साल में बदल जाते हैं। पहली सुबह डरे हुए बच्चे को जो चाहिए, वह ज़रा भी नहीं हिला।
और गहराई में
बहुतों में एक को देखना, बिना बहुतों से इनकार किए - यह सन्तुलन इस श्लोक का काम है, और दोनों आधे वज़न उठा रहे हैं।
इसे यह मानकर पढ़ना आसान होगा कि भेद भ्रम हैं। संस्कृत यह नहीं कहती। वह कहती है बँटे हुओं में अनबँटी। बँटवारा मान लिया गया है। कुछ अनबँटा भी वहाँ है।
यह व्यवहार में मायने रखता है, क्योंकि चपटा कर देने वाला पाठ सचमुच नुक़सान करता है। किसी से यह कहना कि उसकी ख़ास हालत एक भ्रम है, ज्ञान नहीं है, वह न सुनने का एक तरीक़ा है। यहाँ बताया गया साफ़ ज्ञान आपको किसी ख़ास आदमी के प्रति ज़्यादा ध्यान देने वाला बनाएगा, कम नहीं।
और यह आपके पास है या नहीं, इसकी कसौटी रहस्यमय नहीं, बर्ताव की है। वह ऐसे दिखती है कि आप किसी ऐसे आदमी में, जिसका जीवन आपके जैसा बिलकुल नहीं है, उस दशा को पहचान लेते हैं जिसमें आप ख़ुद रह चुके हैं।