Gita Explained
कृष्ण कहते हैं18.31

यया धर्ममधर्मं च कार्यं चाकार्यमेव च।अयथावत्प्रजानाति बुद्धिः सा पार्थ राजसी॥

yayā dharmam adharmaṃ ca kāryaṃ cākāryam eva caayathāvat prajānāti buddhiḥ sā pārtha rājasī

शब्दार्थ
yayā: by whichdharmam: righteousnessadharmam: unrighteousnessca: andkāryam: right conductca: andakāryam: wrong conducteva: certainlyca: andayathā-vat: confusedprajānāti: distinguishbuddhiḥ: intellectsā: thatpārtha: Arjun, the son of Pritharājasī: in the mode of passion

श्लोक कहता है

जिस बुद्धि से आप सही और ग़लत को, और क्या करना चाहिए और क्या नहीं, उलटा समझ लेते हैं - अर्जुन, वह राजस है।

सरल शब्दों में

बीच वाली क़िस्म। वह सही को ग़लत से अलग करने की कोशिश कर रही है और ग़लत पहुँच रही है।

सवाल से इनकार नहीं। उसके प्रति उदासीन नहीं। उस पर काम करते हुए, और ग़लत जगह पहुँचते हुए।

पूरी पुस्तक में इस धागे की यही ख़ास चूक है। मेहनत मौजूद है। सच्चाई नहीं, क्योंकि कुछ खींच रहा है।

आपने इसे कहाँ महसूस किया है

आपकी सहेली को पक्का यक़ीन है कि अपनी बहन से हुई बहस में वह सही थी, और उसका पक्ष मज़बूत है, और वह उसे अच्छी तरह रखती है। तीन महीने बाद, गरमी उतर जाने पर, वह अचानक कहती है कि शायद अनुचित वही थी। कोई नई बात सामने नहीं आई। उसे बस किसी ख़ास जवाब की ज़रूरत नहीं रह गई।

और गहराई में

ऐसा निर्णय जो सक्रिय हो, सच्चा हो और भरोसे से टेढ़ा हो - यही यहाँ बताया जा रहा है, और टेढ़ेपन की एक दिशा है।

यह उलझन नहीं है। उलझा हुआ आदमी जानता नहीं। यहाँ बताया गया आदमी जानता है, पूरे भरोसे से, और ग़लत है, और ग़लती बेतरतीब नहीं है। वह उसी ओर झुकती है जो वह पहले से चाहता था।

वेगवाला धागा समझ के साथ यही करता है। वह क्षमता बन्द नहीं करता। वह उस पर अँगूठा रख देता है, और अँगूठा भीतर से दिखता नहीं, क्योंकि निकला हुआ निर्णय बिलकुल किसी और निर्णय जैसा ही लगता है।

इसे ठीक भरोसे से केवल समय या दूरी करती है, इसीलिए किसी झगड़े पर आपका अपना फ़ैसला तीन महीने बाद कहीं ज़्यादा क़ीमती होता है। इसीलिए बहस के बीच एकमात्र काम का सवाल यह नहीं कि क्या मैं सही हूँ, बल्कि यह कि अगर जवाब से आपका कुछ न जाता, तब भी आप इसी नतीजे पर पहुँचते।

इस श्लोक के विचार