यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्।स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः॥
yataḥ pravṛttir bhūtānāṃ yena sarvam idaṃ tatamsva-karmaṇā tam abhyarcya siddhiṃ vindati mānavaḥ
शब्दार्थ
श्लोक कहता है
जिससे सब जीव निकले हैं, जिससे यह सब फैला हुआ है - उसी को अपने काम से पूजकर आदमी पूर्णता पाता है।
सरल शब्दों में
और यह रहा तरीक़ा। उपाय एक शब्द में दे दिया गया है।
अभ्यर्च्य - पूजकर, चढ़ाकर। काम ही चढ़ावा बन जाता है।
काम और उसके साथ पूजा नहीं। काम और फिर पूजा नहीं। काम ही, उसी को चढ़ाया गया जिससे सब कुछ निकला।
आपने इसे कहाँ महसूस किया है
आपकी मौसी हर रविवार परिवार के लिए खाना बनाती हैं और दशकों से बनाती आई हैं। वे इसे लेकर भावुक नहीं हैं और आप इसे भक्ति कहें तो हँस देंगी। पर उनका ध्यान जाता है कि कौन नहीं खा रहा, और उन्होंने एक बार भी वह चीज़ नहीं बनाई जो सिर्फ़ उन्हें पसन्द है। हर हफ़्ते उस रसोई में कुछ बाहर की ओर मोड़ा जा रहा है।
और गहराई में
काम का चढ़ावा बन जाना, न कि चढ़ावे से बीच में टूट जाना, इस श्लोक की पूरी चाल यही है।
पुराना चित्र दोनों को अलग रखता था। एक यज्ञ था, ख़ास जगह पर ख़ास सामग्री से किया हुआ, और फिर आपका बाक़ी जीवन। यह दूरी मिटा देता है। जो आप वैसे भी करने वाले थे, वही चढ़ावे की सामग्री बन जाता है।
यही चार समूहों को उनके दिखने से कम अहम भी बना देता है। अगर कोई भी काम चढ़ाया जा सकता है, तो काम की सामग्री यह तय करना छोड़ चुकी है कि आध्यात्मिक रूप से आपके लिए क्या सम्भव है। व्यापारी और शिक्षक के पास एक जैसी पहुँच है।
पाठक के लिए व्यावहारिक हिस्सा दिशा है। काम नहीं बदलता, घंटे नहीं बदलते, और दिन में कुछ जोड़ना नहीं पड़ता। बदलता यह है कि वह किसकी ओर किया जा रहा है, और यही वह एक चर है जिस पर यह पुस्तक लौटती रहती है।