Gita Explained
कृष्ण कहते हैं3.12

इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः।तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुङ्क्ते स्तेन एव सः॥

iṣṭān bhogān hi vo devā dāsyante yajña-bhāvitāḥtair dattān apradāyaibhyo yo bhuṅkte stena eva saḥ

शब्दार्थ
iṣṭān: desiredbhogān: necessities of lifehi: certainlyvaḥ: unto youdevāḥ: the celestial godsdāsyante: will grantyajña-bhāvitāḥ: satisfied by sacrificetaiḥ: by themdattān: things grantedapradāya: without offeringebhyaḥ: to themyaḥ: whobhuṅkte: enjoysstenaḥ: thieveseva: verilysaḥ: they

श्लोक कहता है

तुम्हारे अर्पण से पुष्ट होकर वे शक्तियाँ तुम्हें वह देंगी जो चाहिए। जो वे दें उसे लो और बदले में कुछ न लौटाओ, तो तुम बस चोर हो।

सरल शब्दों में

एक कड़ा शब्द, और वह जान-बूझकर चुना गया है: स्तेन - चोर।

कृतघ्न नहीं। स्वार्थी नहीं। चोर। वह जो किसी परिपथ से लेता है और उसमें कुछ लौटाता नहीं।

तर्क ठीक-ठीक है। यदि आपके पास जो कुछ है वह किसी से होकर आया, और कुछ वापस नहीं जाता, तो आप जो कर रहे हैं उसका एक नाम है।

आपने इसे कहाँ महसूस किया है

एक सहकर्मी रोज़ दफ़्तर की रसोई इस्तेमाल करता है और आज तक न दूध लाया, न कॉफ़ी, न कभी कोई कप धोया। कोई नियम नहीं टूट रहा और किसी ने एक शब्द नहीं कहा। सबको पता है।

और गहराई में

यह आरोप केवल इसलिए चलता है कि आसपास के श्लोकों में एक चित्र खड़ा किया गया है। आपके पास जो कुछ है, वह स्वयं-उत्पन्न नहीं है।

भोजन वर्षा और मिट्टी और उस श्रम से आया जो आपने नहीं किया। जिस भाषा में आप सोचते हैं वह आपको थमाई गई। कौशल सिखाए गए। इस लेखे में स्वयं-निर्मित स्थिति जैसी कोई चीज़ नहीं होती, केवल ऐसी स्थिति होती है जिसने अपनी आपूर्ति-रेखाएँ देखना बन्द कर दिया है।

अप्रदाय - वापस दिए बिना। पूरा आरोप यही है।

जो यह नहीं कहता वह यह कि आप पर कोई विशेष अनुष्ठान बाक़ी है। श्लोक ९ यज्ञ को अग्निकुंड से आगे खींच चुका है। जो माँगा जा रहा है वह यह कि गति आप पर रुकने के बजाय आपमें से होकर चलती रहे।

और इसमें एक मनोवैज्ञानिक दावा भी लिपटा है, जिसे अध्याय श्लोक १६ पर खोलकर कहेगा। जो जीवन केवल लेता है वह भरा-पूरा नहीं लगता। वह डाँवाडोल लगता है, क्योंकि उसमें सब कुछ थामा हुआ है, गुज़रता हुआ नहीं।

इस श्लोक के विचार